Wednesday, May 20, 2015

खरी- खरी




अपने
मरते ही
तुम एक पेड़ अपने  साथ जलाते हो
भला जन्मते ही क्या तुम एक पेड़
अपने साथ लाते हो या
इस धरती पर पॉँव रखते ही उसे उगाते हो !

भाई , ऐसा ही चलता रहा
तो ये पेड़ हमारे कितने दिन चल पायेँगे
मरने पर तो छोड़ो
जिंदा रहते भी तुम्हें  ये
सांस के लिये हवा नहीं दे पायेँगे।

मेरी मानो
पेड़ों के कम होने की हालत पर
ज़रा दृष्टि डालो
और मरने और पैदा होने के
रिवाजों में पेड़ उगाने की रिवायत डालो।              



महशून्य



कल 
में से निकलता है आज 
आज में से निकलेगा  - कल । 
यूँ हीं 
उतरती प्याज़ की परतें 
                उतरती परतें ... 
और फिर एक दिन बचता है 
           शून्य .. महशून्य …  ।    

Thursday, May 14, 2015

एक सत्य यह भी



मृत्यु में प्राणी 
गहरी काली नींद के उस पार ही 
निकल जाता है अपने चेतन व अवचेतन को 
छोड़कर कभी न लौटने के लिये। 

काले स्याह पर्दे के पीछे याकि 
महाप्रकाश पुंज में समाता ही चला जाता है याकि 
कहीं चला जाता है इस देह को छोड़कर। 

वैसे वह हमारे बीच ही होता है 
एक नई पहचान लेकर 
फूल,पेड़,जानवर,इंसान या कुछ भी 
या जिसे हम चाहें भी या न चाहें 
मगर होता यहीं है वह लगातार 
हमारे भीतर बाहर 
हमारे वायदों को घूरता 
हमे देखता 
हमारी आंख्नो के सामने 
अपहचाना।              


नींद एक जीवन/ मृत्यु



नींद 
भी  तो 
एक तरह से मृत्यु का ही एक  लघु रूप होता है। 
जो  हमें निचेश्ट कर प्रारूपित करता है कुछ पलों के लिए 
नीचे - गहरे नींद की आगोश में 
और हम 
एक नया लोक आलोक कर लेते  हैँ 
अपनी मनोकामनाओं को पूरा करने के लिए। 
तब हम यहाँ के संस्मरणों के स्मरण के इलावा 
सब कुछ खो चुके होते हैं। 

और 
नींद पूरी होने पर 
बिस्तरयान पर पड़े हमे यह अहसास 
भी नहीं होता कि हम एक 
छोटी मृत्यु को जी भी चुके हैं।                     




Monday, May 11, 2015

नींद एक जीवन/ मृत्यु



नींद 
भी  तो 
एक तरह से मृत्यु का ही एक  लघु रूप होता है। 
जो  हमें निचेश्ट कर प्रारूपित करता है कुछ पलों के लिए 
नीचे - गहरे नींद की आगोश में 
और हम 
एक नया लोक आलोक कर लेते  हैँ 
अपनी मनोकामनाओं को पूरा करने के लिए। 
तब हम यहाँ के संस्मरणों के स्मरण के इलावा 
सब कुछ खो चुके होते हैं। 

और 
नींद पूरी होने पर 
बिस्तरयान पर पड़े हमे यह अहसास 
भी नहीं होता कि हम एक 
छोटी मृत्यु को जी भी चुके हैं।                        

नींद एक - सफर

छूट जाती है
यह देह हमारी यहाँ 
इस बिस्तर पर और होश हमारा 
निकल जाता है 
हमारी अद्श्य देह लेकर 
अपने ही रचे 
एक श्रुण भंगुर  संसार में। 

तोड़ता - जोड़ता , बनता -बिगाड़ता 
अतृप्त से तृप्त होने को। 

पुनः होश फिर आ जुड़ता है इस देह  में 
तृप्त  से अतृप्त होने को 
नींद पूरी होने पर।             

Saturday, May 9, 2015

एक के नहीं 
अनेक के 
ढोल पर थाप देने से ही 
गिरती है पुरानी व्यवस्था की दीवार ,
मगर पुराने नींव -नक़्शों पर 
नयी सोच नहीं चढ़ेगी परवान। 

इस पुराने दुर्ग की दीवारों व छतों  को 
नये प्लस्तर व रंग लेपने - पोतने  भर से 
बदल नहीं जाने वाला इस व्यवस्था का व्यवहार। 

नया कुछ चाहिए तो इसे 
नींव से ही बदलना होगा 
अपनी सदियों पुरानी 
सोच  को बदलना होगा।