Monday, August 30, 2021

 निठल्ला समय  खो गया है

 

निठल्ला

समय 

खो गया है 

कि तुममें कोई 

भागमभाग का पौधा बो गया। 

अब यह जीवन 

तुम्हारा नहीं रहा 

न जाने कब से 

पूरा का पूरा इस शहर का हो गया है।

अब रोने/पछताने से 

कुछ न होगा

यह तो कब से 

एक गोल रोटी का 

गुलाम हो गया है।

    ---- सुरेन्द्र भसीन



Sunday, May 23, 2021

माँ ओ मेरी माँ

माँ ओ मेरी माँ

विश्वास नहीं होता
कि अब वो नहीं रही...
अपने को समझाने के लिए
रोज उनके चित्र पर फूल चढाता हूँ,
रोज उनके चित्र के आगे नमन करता हूँ,
रोज उनको दीप-धूप भी करता हूँ मग़र
फिर भी विश्वास नहीं होता???
अपने को समझाता हूँ बार बार कि
अब वो नहीं रही, नहीं आयेगी, नहीं समझाएगी 
दुनिया की ऊंच-नीच
नहीं रोकेगी, नहीं टोकेगी
नहीं रोटी-पानी पूछेगी
न पूछेगी बच्चों का हाल चाल
नहीं नाराज होगी
नहीं नाराजगी झेलेगी, न ही मनाएगी।
मग़र मन यह मानता ही नहीं
मन तो यही कहता है कि
वो नहीं गयी कहीं, जायेगी भी नहीं कभी..
भीतर ही समायी है अभी
सदा फिजाओं में रहेगी, हमारे साथ
सुबह जगायेगी
जिम्मेवारियों का अहसास करायेगी और
मेरी बगिया के 
नन्हें फूलों की रक्षा करो
रोज रोज यही कहती जायेगी..
इसलिए मन कहता है कि
वो कहीं नहीं गई 
न जायेगी कभी।
      ----  सुरेन्द्र भसीन

Saturday, October 24, 2020

हम सब में ही है रावण

 नहीं

मैं नहीं मरूंगा!

जितना भी क्यों न जला लो तुम मुझको

मैं कभी नहीं जलूँगा!

मैं तुम्हारे वजूद का हिस्सा जो हूँ

हँसी, खुशी,सुख,आनंद,प्रेम आदि के साथ

दुख, क्रोध,हिंसा,हवस बनकर

तुम्हारे भीतर ही पैठा हूँ

तुममें ही जीता हूँ यकसार होकर

तुम्हारी ज़रूरत बनकर...

फिर चाहो या न चाहो

जब-तब, बार-बार निकल/उबर आता हूँ

कालिया नाग बनकर

तुम्हारे जीवन जल को जहरीला करने याकि

कोई पुराना श्राप बनकर या फिर

राहू का ग्रहण बनकर

तुम्हें ग्रसने!

मुझे मालूम है तुम सब

राम या कृष्ण नहीं बने रह सकते हो जीवन भर

तो मैं भी

आता ही रहूँगा तुममें बार बार

अपनी विद्रुप हँसी हँसता

वासना का काला नाग बनकर

तुम्हें बार बार

डसने!

        ------   सुरेन्द्र भसीन

Tuesday, February 25, 2020

दादू राम अगाध

         दादू
यह देह भी क्या शह है कान भी निरे सूप हो जाते हैं कभी-कभी और भीतर लगे हैं श्रवण यन्त्र, कान की इन्द्रियाँ पकड़ लेती हैं अहम की बातें और भेज देती हैं आगे- मन के पास...और मन मनभावन रोक कर भेज देता है बाकी मस्तिष्क की मशीन में... और वह तो जैसे रूकती ही नहीं, पीसती है, भेदती है तत्व को। मस्तिष्क की मशीन तो चलती ही रहती है सदा मेरे भीतर कोयले वाले इंजन के पहियों की तरह! गोल-गोल। आगे भी पीछे भी। छुक.. छुक..छुक..छुक...
       हफ्ताभर भी नहीं हुआ इस नये शहर दिल्ली में, देश के दिल में उतरे। गर्मियों के लंबे दिन। पंखे के तो अपने ही पसीने भी नहीं सूखते। शाम छह बजे उठते उठते भी बॉस के कमरे से आती आवाजें पड़ ही गई कानों में-
सर! किसको पकड़ लाये?
किसकी बात कर रहे हो?
वही जो नया आया है जीवन प्रकाश! निरा बावला है, भला उससे क्या  होगा?
तुम्हें इससे क्या?
आज पकड़ लिया चपरासी रामू को और कहने लगा जाओ माफ़ी मांगो उस दरवाजे से। इतनी जोर से बंद किया तुमने उसे! कितना चीखा वह दरवाज़ा जोर से दर्द में।
तो क्या कहा रामू ने?
रामू क्या कहता भला! लगा खीसे निपोरने! अब साहब क्या करता गुस्से में था तो जरा कर दिया जोर से बंद..
...। ....और फिर भला दरवाजे में कहाँ जान है, वह भला कहाँ सुनता या जवाब देता है?
फिर आप सुनें, आगे से क्या कहता है जीवन?
"कि जब उसमें जान नहीं, उसने कुछ कुसूर किया नहीं तो क्यों निकाला गुस्सा अपना उस बेजुबान पर!"
लो कल लो बात! -अब सारा सामान ही इसके मामे हो गये!
इस साधू से तो पत्रकारिता का मंथन होने से रहा...
समेट तो मैं चुका ही था अपनी टेबल। अपनी

Friday, January 24, 2020

वैसे तो
महज एक आवाज ही
दूर थी वो मुझसे
मग़र सालों-साल वो हलक से ही न निकली...
मीलों-मील हो गईं हैं दूरियाँ
काली घुमावदार तारकोली सड़कों-सी
बिछ गई हैं दरमियाँ में
अगर-मगर, किन्तु-परन्तु के आवरण चढ़ चुके हैं भावनाओं पर और
छोटी भोली पगडंडी-सी गलतियां अब नहीं रहीं।
मन तो प्याज की गुठली-सा
दबा पड़ा है अपने ही कलेवर के नीचे
जैसे बरसों से बेगाने होकर रह रहे हैं हम
एक ही छत के नीचे...
स्वयं में उलझे जैसे दो ऊन के गोले
देखो कब खुलते हैं...
हम फिर शादी से पहले जैसे
कब मिलते हैं?

Wednesday, December 18, 2019

सर्दी - एक प्रलाप

वो सर्दी
जो मेरी जवानी में
आँख मिला न पाती थी कभी
उसने अब मुझे हरा दिया है
मेरे हाड़ और आत्मबल को कंपा दिया है
मुझे बिस्तर पर ढा दिया है...
दवाइयों की अनगिनत गोलियाँ
वैसे मैंने चलाईं हैं उसपर
मग़र वो मरती ही नहीं
सीने पर चढ़ी है आजकल मेरे
पहाड़-सी खड़ी है आगे मेरे
उसने तो मुझे रूला दिया है...
मुझपर अपना कर्फ़्यू लगा
चारों खाने चित्त कर
बिस्तर पर लिटा दिया है...
अब जब तक वो नहीं जायेगी
तबतक मैं गर्म पानी ही पीऊँगा
गर्म पानी से नहाऊँगा
न कहीं आऊंगा
न कहीं जाऊँगा
रजाई में घुसा-घुसा
सर्दी..बड़ी सर्दी... ही चिल्लाऊंगा।
      -----    सुरेन्द्र भसीन




Thursday, December 12, 2019

वजह

मुस्कुराओ
तो मुस्कुराते ही चले जाओ
वजह मत ढूंढने लग जाओ
कभी मुस्कुराने की...
फिर मुस्कान खो जाती है
अपनी हँसी भी
परायी हो जाती है...।
याद में भी नहीं आता तब फिर
कि हम मुस्कुराये थे कभी
वजह से नहीं
बेवज़ह भी...।
      -----    सुरेन्द्र भसीन

Tuesday, December 3, 2019

सही है कि
बोलना तो
लोगों को नहीं आता
चुप रहना भी नहीं आता...
गलत वज़ह से गलत जगह पर चुप जो रह जाते हैं-
समाज में,पेशे में, सम्बन्धों में -
इसलिए पिछड़ जाते हैं/मात खा जाते हैं/
दब्बू, भीरू या डरपोक भी कहलाते हैं
अपनी बहन-बेटियों की रक्षा नहीं कर पाते
सड़क पर हुए हादसों को, हिंसा को, बलात्कार को
दूसरों के साथ हुआ बताते हैं
अपने साथ हुआ यह समझ नहीं पाते
गलत वजह/गलत जगह पर चुप जो रह जाते हैं
इसलिए अगला शिकार बन जाते हैं..
          ------           सुरेन्द्र भसीन

Sunday, November 17, 2019

मौत से पहले

सुना है
वक्त नहीं है किसी के भी पास...
शहरों में वक़्त ज्यादा तेजी से
बीता जा रहा है
लोगों पर बुढ़ापा भी
जल्दी आ रहा है
वक़्त तेजी से
जिस्मों को खा रहा है
आदमी अंदर तक भुरभुराता
छीजता जा रहा है
जल्दी ख़त्म हुआ जा रहा है।
अपनी मौत से पहले मरा जा रहा है।
         -----     सुरेन्द्र भसीन 

Tuesday, November 12, 2019

चाहतों के दायरे

पूरा ही नहीं पड़ता
कोई सा भी दायरा
चाहे कितना भी बड़ा ही
क्यों नहीं खींचें हम अपनी चाहतों का...
सदा बहुत कुछ
बाहर ही रह जाता है....और...
आखिर में अपने दायरे में आदमी
अकेले ही खड़ा रह जाता है
न हँस पाता है...
न रो पाता है...
अपने ही दायरे में सिमटा सिमटा
छोटा बिंदु हो जाता है...
     -----   सुरेन्द्र भसीन

सहजता

सहजता
धीमा बोलना
सहज बोलना
मधुर बोलना ही ठीक है...
मानाकि ऊंचा बोलना या
कर्कश शोर क्षण भर तो प्रभावित
कर जाता है
मग़र शीघ्र खत्म होकर किसी काम नहीं आता है।
धीमा बोलना
सबको भाता है
सच का दम रखता है
ह्रदयों में बस जाता है
लंबे समय तक काम आता है।
     -----    सुरेन्द्र भसीन

व्यक्तित्व

व्यक्तित्व
तुम
भीतर तक
दुख पाए हुए हो
जैसे दीमक खायी कोई लकड़ी...
ऊपर से साबुत दिखती
मग़र भीतर से तमाम खोखली...
वज़न नहीं उठा पाती
भुरभुरा कर टूट जाती...
तुम भी
ज़रा-सी तखलीफ़ में भरभरा जाते हो
बिखर कर
अपने ही ऊपर आ जाते हो
रुआंसे हो जाते हो...
     ----    सुरेन्द्र भसीन




Wednesday, November 6, 2019

कई कई बार
दृष्टि बस वही देखती है
जोकि हम देखना चाहते हैं
बुद्धि वही समझती है
जो हम समझना चाहते हैं
दो जमा दो आठ अगर
बैठ गया किसी वक़्त दिमाग में तो
चार फिर हो ही नहीं पाता है
अपनी इन्हीं जरूरतों-इच्छाओं को
जहन में समेटे गरीब
नेताओं के सम्मोहन के जाल में
तब फंस जाता है जब चुनाव में वायदों का
झुनझुना उसके कान में बजाया जाता है
और हर चुनाव के बाद
ठगे,अवाक से हम
यह नहीं झ पाते कि
हमसे हर बार हमारे ही विरूद्ध
षड्यंत्र कैसे कराया जाता है।
       ------     सुरेन्द्र भसीन

Tuesday, November 5, 2019

समायिक प्रश्न

मुझे
मालूम है कि
प्रदूषण की विकरालता से जब
पूरी धरती तबाह होने को आयेगी
तो तब भी 
पीछे बचे चंद नकारा नपुंसक राजनैतिक बुड्ढे जो अपनी डालों(पदों)
से चिपटे काँव-काँव करते और
एक दूसरे पर दोषारोपण करते
यह तय नहीं कर पायेंगे कि
यह सब किसकी वजह से हुआ?
...आज प्रश्न बड़ा यह है कि-
मुश्किल यह प्रदूषण है याकि
काँव-काँव करते यह काइयाँ निठल्ले बुड्ढे?
निवारण पहले किसका किया जाये?
बचना, बचाना हमको किससे है?
धोना/रोना हमको किसको है?
     ------           सुरेन्द्र भसीन

Wednesday, October 23, 2019

अंदर से तो
आप समझते ही हैं कि आपके साथ क्या सही हो रहा है और
क्या गलत?
कौन सही कह कर रहा है और
कौन आपका सिर्फ मुँह धो रहा है? कौन वक्त पर काम आयेगा आपके
और कौन चला जायेगा
मुंह मोड़कर
बीच बियाबान छोड़ कर।
मग़र अहम में/तारीफ के
स्वाद में डूबे तुम उनसे
जो आप अपना पल्ला नहीं छुड़ाते हो तो कल यही तुम्हें काटेंगे आस्तीन के सांप बनकर
पद के मद में तुम्हें यह क्या नहीं सूझता?
कि आगे पश्चताप का बदबूदार नाला आने वाला है
जिसमें गिरकर तुम्हारा भूतकाल काला हो जाने वाला है।
         ------     सुरेन्द्र भसीन

Thursday, October 10, 2019

आँसू
तो राम की आँखों
में भी आये थे
सीता हरण के बाद।
जार जार भी रोये थे
लक्ष्मण मूर्छा के बाद।
व्यथित भी हो गए थे
अपने पिता के देहावसान के बाद।
तो क्या?
सब को संताप होता है
ये सभी कुछ होने के बाद...
मगर जीवन तो फिर भी चलता ही है
यह सब कुछ होने के बाद।
निर्मोही थे कृष्ण महाराज
क्षण भर में बिसार देते थे
यह सबकुछ होने के बाद।
      ------       सुरेन्द्र भसीन

Monday, October 7, 2019

उसने मुझे सिखाया
उसने मुझे समझाया
उसने मुझे करके भी बताया
मग़र मेरे समझ नहीं आया।
किंतु जब वो चली गई तो
उसके विरह के प्रकाश में
मुझे समझ आया कि
प्यार क्या है?
       -----     सुरेंद्र

Saturday, August 31, 2019

मेरे
एक-एक शब्द को
एक-एक पल को
वह जी लेना चाहती थी
पी लेना चाहती थी चातकी बनकर
वर्षा बून्द के समान
धरती पर गिरने/किसी के सुनने
किसी के समझ लेने से पहले ही
सर्वप्रथम!
उसकी पिपासा शारीरिक न होकर आत्मीय थी
प्रेम प्रदर्शन से कोसों दूर
सरल सहज जैसे
मुझ पर न्योछावर होती
सर्दियों की गुनगुनी धूप!
       -----     सुरेन्द्र भसीन

Friday, August 30, 2019

मिल जाते हैं
जीवन के रास्ते में मील के पत्थर
जो बताते हैं कि
रास्ता कितना तय हो गया कि
कितना बाकी रह गया...
आदमी कितना खर्च हुआ और
कितना बचा रह गया या
आदमी कितना सह गया
और कितना उसको झेलना रह गया।
जन्मदिन भी कुछ इसीलिए/ इसी कदर आते हैं
जब आईने में अपने सफेद हुए बाल देखे जाते हैं
तब हमारे ही बच्चे हमें अकेला छोड़
हमसे दूर विदेशों में बस जाते हैं
हम अपने किए पर चाहे पछताते हैं
तब हमारे ही बाल
हमारे नोचने के काम भी नहीं आते हैं।
          -------      सुरेन्द्र भसीन

Thursday, August 29, 2019

लंबी
मुश्किल हो गई जीवन यात्रा में
जब कोई पड़ाव/आराम नहीं आता
तो मन बड़ा घबराता है कि
यह रास्ता मुझे किस रसातल में लिए जाता है याकि
इतना लंबा क्यों है?
खत्म होने को क्यों नहीं आता है...?
संस्कार,पूर्वजों,देवी-देवताओं का
आशीर्वाद तभी हमारे काम आता है
जो हमें
धैर्य, सस्यम से लगातार
उद्देश्यरूपी दिए की ओर
बढ़ते जाना सिखाता है
वरना बीच रास्ता भटकते/अटकते
देर नहीं लगती...
मनुष्य मनोरंजन में डूबकर
कहीं का कहीं और ही पहुँचकर
सब बर्बाद कर जाता है।
      -----      सुरेन्द्र भसीन