Wednesday, December 18, 2019

सर्दी - एक प्रलाप

वो सर्दी
जो मेरी जवानी में
आँख मिला न पाती थी कभी
उसने अब मुझे हरा दिया है
मेरे हाड़ और आत्मबल को कंपा दिया है
मुझे बिस्तर पर ढा दिया है...
दवाइयों की अनगिनत गोलियाँ
वैसे मैंने चलाईं हैं उसपर
मग़र वो मरती ही नहीं
सीने पर चढ़ी है आजकल मेरे
पहाड़-सी खड़ी है आगे मेरे
उसने तो मुझे रूला दिया है...
मुझपर अपना कर्फ़्यू लगा
चारों खाने चित्त कर
बिस्तर पर लिटा दिया है...
अब जब तक वो नहीं जायेगी
तबतक मैं गर्म पानी ही पीऊँगा
गर्म पानी से नहाऊँगा
न कहीं आऊंगा
न कहीं जाऊँगा
रजाई में घुसा-घुसा
सर्दी..बड़ी सर्दी... ही चिल्लाऊंगा।
      -----    सुरेन्द्र भसीन




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