Wednesday, December 18, 2019

सर्दी - एक प्रलाप

वो सर्दी
जो मेरी जवानी में
आँख मिला न पाती थी कभी
उसने अब मुझे हरा दिया है
मेरे हाड़ और आत्मबल को कंपा दिया है
मुझे बिस्तर पर ढा दिया है...
दवाइयों की अनगिनत गोलियाँ
वैसे मैंने चलाईं हैं उसपर
मग़र वो मरती ही नहीं
सीने पर चढ़ी है आजकल मेरे
पहाड़-सी खड़ी है आगे मेरे
उसने तो मुझे रूला दिया है...
मुझपर अपना कर्फ़्यू लगा
चारों खाने चित्त कर
बिस्तर पर लिटा दिया है...
अब जब तक वो नहीं जायेगी
तबतक मैं गर्म पानी ही पीऊँगा
गर्म पानी से नहाऊँगा
न कहीं आऊंगा
न कहीं जाऊँगा
रजाई में घुसा-घुसा
सर्दी..बड़ी सर्दी... ही चिल्लाऊंगा।
      -----    सुरेन्द्र भसीन




Thursday, December 12, 2019

वजह

मुस्कुराओ
तो मुस्कुराते ही चले जाओ
वजह मत ढूंढने लग जाओ
कभी मुस्कुराने की...
फिर मुस्कान खो जाती है
अपनी हँसी भी
परायी हो जाती है...।
याद में भी नहीं आता तब फिर
कि हम मुस्कुराये थे कभी
वजह से नहीं
बेवज़ह भी...।
      -----    सुरेन्द्र भसीन

Tuesday, December 3, 2019

सही है कि
बोलना तो
लोगों को नहीं आता
चुप रहना भी नहीं आता...
गलत वज़ह से गलत जगह पर चुप जो रह जाते हैं-
समाज में,पेशे में, सम्बन्धों में -
इसलिए पिछड़ जाते हैं/मात खा जाते हैं/
दब्बू, भीरू या डरपोक भी कहलाते हैं
अपनी बहन-बेटियों की रक्षा नहीं कर पाते
सड़क पर हुए हादसों को, हिंसा को, बलात्कार को
दूसरों के साथ हुआ बताते हैं
अपने साथ हुआ यह समझ नहीं पाते
गलत वजह/गलत जगह पर चुप जो रह जाते हैं
इसलिए अगला शिकार बन जाते हैं..
          ------           सुरेन्द्र भसीन