सामाजिक व्यवस्था
अब
झूठ भी
सामाजिक व्यवहार ही हो गया है
एक मान्यता प्राप्त छूट याकि सुविधा-
मैंने तो देखा नहीं
मुझे पता ही नही
मैं नहीं जानता या मानता
तुम्हारे पास क्या सुबूत है
मेरा यह मतलब तो नहीं था
वे घर या ऑफिस में नहीं हैं
मैं जरूरी मीटिंग में हूँ
और आँकड़ों व तथ्यों के साथ
मनमानी खिलवाड़ भी तो एक आम बात है..
कही बात से मुकरना?
- मैंने तो ऐसा कहा ही नहीं।
कि कौन रिकॉर्डिंग हो रहा है।
सब चल रहा है धड़ल्ले से...
आदमी गिर गिट से भी तेज रंग बदल रहा है
और फिर
अपनी होशियारी पर
कमीनी-कुत्सित हंसी हंसता है।
एक दूजे को मानो हवा परोसकर
वह किसको ठगता है?
अपने ही मकड़ जाल में
दिनों दिन और और उलझता है।
क्या ऐसे ही
लंबी दूरी तक
कोई समाज/व्यवस्था बना चलता है।
---------- सुरेन्द्र भसीन
अब
झूठ भी
सामाजिक व्यवहार ही हो गया है
एक मान्यता प्राप्त छूट याकि सुविधा-
मैंने तो देखा नहीं
मुझे पता ही नही
मैं नहीं जानता या मानता
तुम्हारे पास क्या सुबूत है
मेरा यह मतलब तो नहीं था
वे घर या ऑफिस में नहीं हैं
मैं जरूरी मीटिंग में हूँ
और आँकड़ों व तथ्यों के साथ
मनमानी खिलवाड़ भी तो एक आम बात है..
कही बात से मुकरना?
- मैंने तो ऐसा कहा ही नहीं।
कि कौन रिकॉर्डिंग हो रहा है।
सब चल रहा है धड़ल्ले से...
आदमी गिर गिट से भी तेज रंग बदल रहा है
और फिर
अपनी होशियारी पर
कमीनी-कुत्सित हंसी हंसता है।
एक दूजे को मानो हवा परोसकर
वह किसको ठगता है?
अपने ही मकड़ जाल में
दिनों दिन और और उलझता है।
क्या ऐसे ही
लंबी दूरी तक
कोई समाज/व्यवस्था बना चलता है।
---------- सुरेन्द्र भसीन
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