जन्मदिन!
तो सभी का एक ही होता है ।
जब कोई पूर्ण करता है
उदर से धरा तक की यात्रा
भय से परिपूर्ण
सहमी-सिकुड़ी देह व आंते लेकर
अँखियाँ और मुट्ठियाँ मीचे
न समझ होकर।
उधर ज्ञान-प्रकाश
नेत्रर्दुगों से प्रवेश करने को आतुर...
माँ की गोद का निर्भय करता आश्वासन...
साथ में गले से होकर
पेट में उतरता
पच-पुच करता अमृत-दूध...
कानों में घुलता अनजान-अ- पहचाना शोर
और यात्रा भरा, रोमांच भरा
एक जन्मदिन होता परिपूर्ण?
होगाकि नहीँ? में झूलता
एक स्नेहमयी अवतरण...।
–---------- सुरेन्द्र भसीन
सहमी-सिकुड़ी देह व आंते लेकर
अँखियाँ और मुट्ठियाँ मीचे
न समझ होकर।
उधर ज्ञान-प्रकाश
नेत्रर्दुगों से प्रवेश करने को आतुर...
माँ की गोद का निर्भय करता आश्वासन...
साथ में गले से होकर
पेट में उतरता
पच-पुच करता अमृत-दूध...
कानों में घुलता अनजान-अ- पहचाना शोर
और यात्रा भरा, रोमांच भरा
एक जन्मदिन होता परिपूर्ण?
होगाकि नहीँ? में झूलता
एक स्नेहमयी अवतरण...।
–---------- सुरेन्द्र भसीन
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