मेरी मजदूरी /मेरी मजबूरी
जब से
सिर पर रखी है नौकरी की टोकरी
यह मुझे रास आने लगी है या पता नहीं
उसकी थकन ही नस-नस से होती हुई
मेरे तलुवों में नाल-सी समा गई है क्योंकि
अब मैं
रात को
सोते-सोते भी हाँ..जी ! हाँ..जी ! करता हूँ ।
और दिन में
आते-जाते हर कुत्ते-बिल्ली तक को सलाम करता हूँ।
मेरी पुरानी आज़ादियाँ
देह छोड़ दूर खड़ी
मुझ पर हंसती हैं
और नयी लागू पाबंदियाँ
मेरे कराहने तक
दिन-भर मेरे नट-बोल्ट कसती हैं।
मानता हूँ मैं
कि मेरा यह दुख
देह का उतना नहीं जितना कि मानसिक है....
कितनी बार मैंने
जबरदस्ती इससे छुटकारा पाया भी है
मगर फिर मैं बाद में स्वयं ही
किसी काम को, सामाजिक मान्यता को व किसी व्यस्तता को तरसता हूँ
और क्या करूं
थक हारकर, मजबूर होकर
इस नाचाही व्यवस्था में आ धंसता हूँ।
-------------- सुरेंद्र भसीन
जब से
सिर पर रखी है नौकरी की टोकरी
यह मुझे रास आने लगी है या पता नहीं
उसकी थकन ही नस-नस से होती हुई
मेरे तलुवों में नाल-सी समा गई है क्योंकि
अब मैं
रात को
सोते-सोते भी हाँ..जी ! हाँ..जी ! करता हूँ ।
और दिन में
आते-जाते हर कुत्ते-बिल्ली तक को सलाम करता हूँ।
मेरी पुरानी आज़ादियाँ
देह छोड़ दूर खड़ी
मुझ पर हंसती हैं
और नयी लागू पाबंदियाँ
मेरे कराहने तक
दिन-भर मेरे नट-बोल्ट कसती हैं।
मानता हूँ मैं
कि मेरा यह दुख
देह का उतना नहीं जितना कि मानसिक है....
कितनी बार मैंने
जबरदस्ती इससे छुटकारा पाया भी है
मगर फिर मैं बाद में स्वयं ही
किसी काम को, सामाजिक मान्यता को व किसी व्यस्तता को तरसता हूँ
और क्या करूं
थक हारकर, मजबूर होकर
इस नाचाही व्यवस्था में आ धंसता हूँ।
-------------- सुरेंद्र भसीन
No comments:
Post a Comment