Thursday, May 31, 2018

वृताकार वक़्त

इस 
वर्त्ताकार वक्त में
कोई आगे, कोई पीछे नहीं होता...
हो चुका भी
होने के पीछे होता है और
होता ही रहता है बस रूप बदल बदल कर..
उम्र का
अमीरी का
अहम का
चक्राकार परिवर्तन निष्चित है
लगातार आदमी को
और और उलझाता
आदमी कोल्हू के बैल की तरह
बस गोल गोल घूमता जीवन बिताता
वर्त्तकार वक्त के चॉक पर चढ़ा
निरन्तर चकराता...।
        ------      सुरेन्द्र भसीन          

Friday, May 25, 2018

कराहते ठूँठ

कराहते ठूँठ

पेड़ हो
इंसान हो याकि सम्बंध
सूखने मत दो कभी
सूखते ही बेकार हो जाते हैं
काट दिए जाते हैं जीवन जड़ों से
वे खुद भी खिलना खिलखिलाना भूल जाते हैं
आखिर सूखापन किसे भाता है
चाहत के न उनपर फूल आते हैं न पत्ते
कोई पक्षी भी बैठना नहीं चाहता है
ऐसे में वे सिर्फ
जलते हैं और जलाने के काम आते हैं
या फिर बस
कराहते ठूंठ रह जाते हैं...
        ------     सुरेन्द्र भसीन

Wednesday, May 23, 2018

बाजार

अकेले में 
जब जब भी लोग
अपनी गिरेबान में झाँकते हैं
तो थर थर काँपते हैं
कोई भी अपने जमीर से आँखे नहीं मिला पाता
आईने में वह खुद का
अक्स नहीं देखते
आईना ही उन्हें घूरने है लग जाता।
कहां तक?
पाप का काला अंधेरा समेटें
कुछ तो पुण्य किरण हो
तभी तो कुछ अक्स है दिखता 
वरना,आईना काला ब्लैकबोर्ड होकर
हमीं को है मुंह चिढ़ाता।
जमीर तो रहा नहीं अब किसीका
दुनिया के बाजार में
सभी कुछ बेख़ौफ़ बिकता है जाता..
         ------    सुरेन्द्र भसीन

Tuesday, May 22, 2018

जंगल ही है

जंगल ही है 


मैं
दो किनारों में नहीं 
झूलता हूँ कभी देर तक
जल्दी ही उकताकर
कोई एक किनारा पकड़ लेता हूँ
अपने निर्णय का सहारा लेकर...
सही या ग़लत
यह वक़्त ही बताता है आगे चलकर
जब  वह मुझे शहर या जंगल में
छोड़ जाता है।
मुझे तजुर्बे से मालूम है कि
आदमखोर तो रहते हैं दोनों ही ओर
जो मुझे चैन से जीने तो नहीं देंगे
कभी किसी भी ओर...
खतरा भी एक समान ही है दोनों ही ओर..
फिर अनिर्णय में
गोते लगाने का लाभ नहीं कोई
झूझने को सदा तैयार रहो तो
निकल चलो, बढ़ चलो
आँख मूंद के
जंगल हो या शहर
किसी भी ओर...।
        -----     सुरेन्द्र भसीन

Sunday, May 20, 2018

अबोध

वस्तुएं हों
स्थितियाँ हों याकि सम्बंध
मैं उन्हें बड़ी मजबूती से
पकड़ता हूँ, जकड़ता हूँ 
मन से,तन से अपनी आत्मा से
छूट जाने का सदा
बड़ा भय खाता हूँ
इसलिए भीतर ही भीतर
कड़ा हो जाता हूँ तो
सहज व्यवहार नहीं कर पाता हूँ...
दरअसल मैं
जीना सीखा ही नहीं हूँ
मैं अभी
अबोध ही हूँ
अनुभवी होना चाहता हूँ।
         ------      सुरेन्द भसीन

Friday, May 18, 2018

...बढ़ती बेलें

....बढ़ती बेलें 

लड़कियाँ
अनुभव कमाने के लिए,
समझदार होने के लिए
कहीं दूर नहीं जाती हैं
अपने आस पास की,करीब की
छोटी छोटी बातों से ही
बड़ी बड़ी समझदारी सकेर लाती हैं
वो ज्यादा देखती हैं या
ज्यादा महसूस करती हैं या
बातों के साथ ढ़ेर सारा वक्त बीतती हैं?
मगर
तन से, मन से जल्दी ही
बड़ी और समझदार हो जाती हैं।
          -------      सुरेन्द्र भसीन

Thursday, May 17, 2018

पत्नी / पटरी

तुमने कभी
मुझे देखा ही कब है,
सोचा ही कब है? 
तुम तो यूँ ही
हर बार निर्द्वन्द्व गुजर जाते हो मुझ पर से
जैसे पटरी को रौंदती
धड़धड़ाती निकल जाती है कोई मालगाड़ी जल्दबाजी से
लाल लाल आंखे, गर्म गर्म सांसे लिए
अपने काम में, अपने अहम में डूबी
अनजाने गंतव्य की ओर...
तुम्हें कभी परवाह नहीं रही मेरी कि
मैं कितनी अकेली, कितनी सूनी
हो जाती हूँ।
और फिर कितने लंबे समय के बाद
ठंडी, सामान्य हो पाती हूँ
तुम्हारे यूँ बेपरवाह गुजर जाने के बाद...
चाहे तुम यही मानों कि मैं 
लोहे की बनी हूँ
मगर पूरी तरह गरमा जाती हूँ
तुम्हारे, अपने ऊपर से गुजरने के बाद...
तुम्हारी पटरी होकर
तुम्हारी पत्नि होकर !
      ---------  सुरेन्द्र भसीन