Sunday, October 29, 2017

....यान है दिमाग

सबसे बड़ा
हथियार, औजार और यान है दिमाग।
जो हमारे सो जाने पर भी
नहीं सोता है
और वक़्त की तरह
दिन-रात अनवरत चलता है।
हमारे न चाहने पर भी
हमें कहाँ-कहाँ घुमाता है
हमारे सो जाने पर भी
क्या-क्या कर जाता है।   
हमारे चुप रह जाने पर भी बड़ा बोलता है
लड़ता है, झगड़ता है , भीतर-बाहर
पुरानी तोड़ता और नयी-नयी घड़ता है।
क्षण भर में जन्मों-सदियों पीछे तो
पलभर में आगे कल्पनाओं के नये लोक में हमें घुमाता है।
वश में रहे तो
इंसान बुलंदियों पर
बेवश हो जाये तो
इंसान को पागल कर
रसातल में मिलाता है।
         -----------           सुरेन्द्र  भसीन

सभ्यता की आड़ में

कोई नहीं पहनता कपड़े
सिर्फ एक इंसान के सिवा
वह भी किससे ?
क्या छुपाना चाहता है ?
क्यों वह जैसा है
वैसा नजर नहीं आना चाहता है ?
क्यों वह अपने आप से डर जाता है ?
अपने काले कारनामों, कमजोरियों,नाकामयाबियों को
अपनी श्रेष्ठता व सभ्यता की आड़ में
छुपाता है ? और  अपने
दिमागी हथियार से सभी को डराता  है।
वो अपने को कितना भी तर्क पूर्ण बना ले
प्रकृति के आगे
निकृष्ठ ही सिद्ध होएगा।
हो न हो
अपने दिमाग के कारण ही
वह एक न एक दिन
इस धरती से अपने
अस्तित्व को खोएगा।
         ----------       सुरेन्द्र  भसीन


ज्ञान

एक
मछली की
तडप-फड़फड़ाहट पर भी
सब चुप हैं।
कोई उसे क्यों नहीं बताता-समझाता
कि पूरा मुँह खोलने पर ही
मछली के मुँह में कभी समुद्र
नहीं समाता।
कि पानी में रहने भर से
पानी अंदर नहीं चला जाता।
उसे खींचना पड़ता है -
साँस दर साँस
जैसे कोई नवजात
धीरे-धीरे थनों से दूध चूसता-चुघलता हो ऐसे।
ज्ञान भी
किताबें खोलने भर से, बांचने भर से ही नहीं आता
अंजुरी-अंजुरी लीलकर
मथना पड़ता है
देवता  स्वरूप मनाना पड़ता है
आग्रह से बैठना पड़ता है।
           -------------           सुरेन्द्र भसीन



समेटते-सिमटते

कितना 
कितना चाहता हूँ मैं 
कि लोगों में बसा रहूँ 
और लोग मुझमें। 
मगर ऐसा चाहकर भी 
हो नहीं पाता है -
मैं बार-बार लोगों से बाहर निकल जाता हूँ अकेला। 
और लोग भी मुझ से बाहर हो जाते हैं 
मुझे छोड़कर वीरान-सुनसान।
फ़ैल जाता है एक 
शून्य का रेगिस्तान 
भीतर से बाहर तक 
अपने को 
समेटते-सिमटते।
       ---------    सुरेन्द्र भसीन        

Saturday, October 28, 2017

कुछ बूढ़े
काले कौवे हैं
ऊँची डालों पर बैठे हुए
आँखों से नया देख-पढ़ नहीं
पा रहे हैं, 
पँख उनके झड़ चुके,
उड़ भी नहीं पा रहे हैं।
अपनी अपनी डाल से चिपके
काँव काँव करके बस
ककर्ष शोर मचा रहे हैं,
डर भी रहे हैं
डाल जो पंजो से छूटे जा रहे हैं इसलिए
नोजवानों को तरह-तरह से
भटका-भरमा रहे हैं और कहते हैं-
सुनो सब! 
हम नयी सुबह का गीत सलौना गा रहे हैं...
झूमो! 
हम नाचने जा रहे हैं...
सीखो!
तुम्हें उड़ना सीखा रहे हैं...? 
       -------     सुरेन्द्र भसीन


Tuesday, October 24, 2017

....फिर एक दिन

पहले भी  कभी
हम सभी थे यहीं
इस शून्य में ,वातावरण में
बस नजर नहीं आते थे.... 
देख पाते थे सभी  कुछ
बोल या उसमें शामिल नहीं हो पाते थे... 
फिर हमारा जन्म हुआ
हम वजूद में आए,
खाने लगे, गाने लगे
चलने लगे , बतियाने लगे ...
अब फिर होगा कभी
एक दिन
हम इस महाशून्य में घुल जाएंगे
विचरेंगे यहीं कहीं
देखेंगे सब कुछ
मगर कह नहीं पाएंगे ...
तो क्या ?
          ---------          सुरेन्द्र भसीन 

वक़्त एक आईना

गीता, बाइबिल, कुरान  या गुरुग्रंथ 
बड़े से बड़ा बम बनाने के फार्मूले के पन्ने (सोच )
एक न एक दिन 
पुराने पड़ जाएंगे 
कूड़े के ढेर में 
पड़े पाए जाएंगे 
और तो और 
मैं ,तुम 
और वे जो आने वाले हैं 
वो भी एक न एक दिन  
मिट्टी में अवश्य मिल जाएंगे... 
वक़्त ही रहा है 
अपनी खामोश 
आवाज के साथ 
और सदा रहेगा। 
       -----           सुरेन्द्र  भसीन