Thursday, August 3, 2017

'ममता के आँसू' - कहानी

'ममता के आँसू'     -  कहानी 

सुबह का समय था।  आराम कुर्सी पर बैठा मैं चाय के साथ अखबार की सुर्खियाँ निगल रहा था। सामने मेरी आठ वर्षीय मुन्नी सोई थी और पत्नी सुलेखा रसोई में दिनचर्या निभा रही थी।  उनदिनों मेरी इस शहर में अभी नयी बदली ही हुई थी।  शहर और मैं एक-दूसरे से अजनबी, अभी आत्मालाप में डूबे थे। 
            तभी मिलाप की पहली कड़ी आ पहुंची।  धड़धड़ाती हुई, बिना देखे, बिना सोचे, बिना जाने और समझे उसने अपना डायलॉग बोला -
            "बीबीजी ! बीबीजी ! सब्जी लीजिएगा ? आलू,टिंडे, टमाटर, प्याज, गोभी....! सब कुछ बिल्कुल ताजा है,एकदम फर्स्टक्लास। देखिए न नहीं कीजिएगा। बसंती ऐसे नहीं जाने की।  पूरी पचास सीढ़ियाँ चढ़ी है आप तक सब्जी पहुँचाने के लिए। "
          आवाज सुन पत्नी भी कमरे में आ पहुँची थी।  दोनों चकित दृष्टि से उसे देखने लगे थे।  हम कुछ बोलते उसने अपना डायलॉग बढ़ाया -
     "आलू एक रुपए, टिंडे डेड रुपए।  रेट किलो के बताए हैं पर बसंती सब्जी तोलेगी किलो और सौ ग्राम। "
           वह न जाने क्या-क्या बोलती और कब तक बोलती चली जाती अगर मैंने उसे टोका न होता तो -
         "बस-बस जरा धीरे बोलो।  देखती नहीं मुन्नी सो रही है। "
  उसके शेष शब्द मानो गले में ही अटक कर रह गए।  थोड़ी सहम गयी और विस्फारित नेत्रों से कमरे में मुन्नी को ढूंढने लगी।  मुन्नी पर नजर पड़ते ही फ़टाक-से उसने अपना टोकरा फर्श पर पटक दिया। भाग के मुन्नी के पास जा पहुँची।  मुन्नी के सिरहाने घुटनों के बल बैठकर वह बड़े वातसल्य से निहारने लगी। बड़े प्यार-से उसने मुन्नी के सिर पर हाथ फेरा।  उसके मन की खुशी आंखों से टपक रही थी जिसने बाद में आंसुओं का रूप ले लिया, उसकी आँखों के कोर  जो भीगने लगे। 
            अत्यंत धीमी व कोमल आवाज़ में उसने मुझसे पूछा -"बाबूजी ! मैं मुन्नी को गोद में ले लूँ ?"
  मैं कुछ कहता तभी माँ की ममता बोल उठी -
     "नहीं ! नहीं ! तुम्हारे उठाने से उसकी नींद खुल जाएगी। " मेरी पत्नी बोली थी। 
"बीबीजी ! मैं इसे बड़े आराम से उठा लूंगी। "
           और उत्तर मिलने से पहले ही उसने मुन्नी को गोद में  उठा भी लिया।  अजीब-सी चमक थी उसके चेहरे पर।  एक सुदीर्घ सुख की पीड़ा से उसका रोम-रोम सम्मोहित हो चुका था। वह भूल चुकी थी मुझे, मेरी पत्नी को। अपने आपको और मानव द्वारा रचित कृत्रिम वातावरण को।  वह पहुंच चुकी थी दूर वातसल्य रस के बादलों पर सवार हो अनंत में।  हम जानते थे, ऐसा संतोष तो हम उसे हीरों से भी न दे पाते। सो, हमने भी अपनी उपस्थिति  को नकार लिया था कुछ पल के लिए।  
          "बसंती तुम तो ऐसा कर रही हो जैसे ये मुन्नी तुम्हारी अपनी हो या फिर याद आ गई हो तुम्हें भी अपनी मुन्नी की। "
           सुख का चरमोत्कर्ष दुख के आगमन का सदैव द्योतक होता है यह प्रकृति का नियम है, ऐसा मैंने सुना था।  प्रत्यक्ष इस सूक्ति का पता तब चला जब बसंती की सिसकियों से कमरा गूंजने लगा। 
           उसने मुन्नी को पलंग पर लिटा दिया और घुटनों में मुँह देकर रोने लगी।  हमारी हिम्मत न हो सकी कि बिना बात जाने उसे किसी प्रकार का दिलासा दे सकें।  बात जानने के लिए हम मूर्तिवत उसका रोना सुन-देख रहे थे।  मैं तो कुछ भी करने, सोचने, समझने की स्थिति से परे था। आखिर मेरी पत्नी ने ही धीमे स्वर में पूछा -"क्या हुआ ?"
            पहले तो वह बताने को तैयार न थी।  लेकिन बहुत कहने पर उसने जो थोड़ा-बहुत बताया वह उसका दुख जानने और औरों तक पहुँचाने के लिए काफी था। 
            उसने कहना शुरू किया -"बीबीजी! मुझे मेरी मुन्नी की याद आ गयी थी।  जिसे मुझे इन हाथों से, हालातों से मजबूर होकर जहर देना पड़ा था। वह भी बिल्कुल ऐसी ही थी। कोमल, व इसी उम्रः की।  मगर समाज के रीति-रिवाजों की भयानकता उसे खा गयी। "
             "बात आज से सात-आठ साल पहले की है।  मेरी शादी को पांच-छ साल हो चुके थे।  घर में मैं,मेरा पति, मेरी सास और हमारे दो बच्चे लड़का और लड़की रहते थे।  घर में गरीबी होने के बाद भी गरीबों की सम्पत्ति "संतोष" घर में थी।  उस समय मैं फूल बेचा करती थी। पति मजदूरी करते, तभी दो वक़्त की रोटी नसीब हो पाती।  तभी घर में एक ओर लड़की का जन्म हुआ।  लड़की के जन्म होते ही मेरी सास और पति को जैसे सांप सूंघ गया।  दोनों का रवैया ही बदल गया था।  मुझे लांछन, डांट-फटकार  और गालियाँ मिलनी शुरू हो गईं। मेरी सास चाहती थी कि यह बच्ची खत्म कर दी जाए लेकिन मुँह से कहने में झिझकते थे। 
            एक दिन मेरी सास ने कह ही दिया कि लड़की पराया धन होती है।  हम गरीब हैं।  उसके पालने,खाने-पिलाने में बड़ी मुश्किल होगी।  इतने चककरों से अच्छा है कि कुछ ऐसा कर कि न रहे बांस न बजे बांसुरी।  मगर मैं न मानी।  मानती भी कैसे ? आखिर माँ थी।  सास ने फिर कहा कि तुम्हारे पास एक लड़की है तो सही, भला दूसरी क्या करेगी ?
             बस, उस दिन से मुझे उठते-बैठते, आतेजाते  यही सीख दी जाने लगी कि इसे मार डाल....मार डाल इसे। मेरी रातों की नींद, सुख-चैन  सब कुछ समाप्त हो चुका था।  रात-दिन इसी बारे में सोचती लेकिन अपनी बच्ची को कोई माँ कैसे जहर दे ? मुझे अपने पति का अभी सहारा था क्योंकि उन्होंने मुझे कुछ न कहा था लेकिन शिकन तो उनके चेहरे पर भी रहती थी।  न  ठीक से बात करते, न  ठीक से खाते-पीते।  और, फिर एक दिन उन्होंने भी मुझे कह दिया कि मैं वही करूं जो मुझे सासु कह रही है। 
                 उस दिन मैं पूरी तरह टूट गई।  मैंने उनके सामने बहुत हाथ-पाँव जोड़े पर उन पर असर न हुआ।  एक-दो बार मुझे घर से बाहर निकल जाने के लिए भी कह दिया गया। 
             और फिर, एक दिन जब घर पर कोई न था। मैंने दूध में जहर मिलाया और मुन्नी को पिलाने लगी।   ....बहुत कोशिश की। पर न पिला सकी।  जैसे ही पिलाने को होती, ऐसा लगता मानो मुझे बड़े जोर से उल्टी आ रही हो।  मैंने मुन्नी को बैठाया और दूध की कटोरी उसके सामने रख कर बिना पिलाए चली आई। 
                आज तक मुझे पता नहीं चला कि मुन्नी का क्या हुआ ? 
अब सोचती हूँ कि अगर घर छोड़ना ही था तो बच्चों को भी साथ ले आती। 
मुन्नी को तो जरूर ही लाना था।  लेकिन अब क्या हो ?"

                        पूरी कहानी कहते-सुनाते  वह कितना रोई व कितनी बार रोई मैं गिन न सका.....  
                       ------------------------           -सुरेन्द्र भसीन 









           































Wednesday, August 2, 2017

'आख़िरी बयान ' - कहानी

'आख़िरी बयान ' -    कहानी 

"मैं ईश्वर को हाज़िर-नाजिर मानकर आपको यह बयान लिखा रहा हूँ कि मैंने स्वयं अपनी इच्छा से व अपने होशो-हवास में आत्महत्या करने की कोशिश की।  जी हाँ! यह खंजर मैंने अपने हाथों से अपने सीने में घुसेड़ा।एक खंजर का दर्द लेकर मैंने कई खंजरों के दर्द से मुक्ति पा ली। मरने से पहले आदमी कितना मरता है, उस यातनामयी मौत से घबराकर मैंने यह मौत चुन ली।  आप इस खंजर को खूनी खंजर कह सकते हैं। लेकिन मेरे लिए यह एक मुक्ति दाता है। "
               उसको बहकते देखकर मैंने उसे टोक दिया - "जनाब !अपने  बयान को संक्षिप्त रखें, ज्यादा बात न बढ़ाते हुए, छोटे-से-छोटा बयान लिखाएँ। "
         मेरे इतना कहने पर उसे जैसे अपनी गल्ती का अहसास हो गया।  वह थोड़ा रुका और कुछ सोचने लगा।  मानों वह बात के टूटे सूत्र को फिर से जोड़ना चाहता हो।  उसने आगे कहना शुरू किया -
"मेरा  पाक़िस्तान में (भारत विभाजन से पूर्व) चाकू-छुरियों का काम था।  वहाँ भी घरेलु हालात अच्छे नहीं थे।  इसी बीच भारत-पाक विभाजन हुआ।  मुझे अपना सभी कुछ वहीँ छोड़कर भागना पड़ा।   भाग-दौड में मेरी पत्नी कहाँ छूटी, उसके बाद क्या-क्या हुआ, मुझे पता नहीं।  वे दिन और आज का दिन मुझे मेरी पत्नी न मिली। 
             मैंने टोका - "एक प्रश्न करना चाहूँगा कि जो इस समय आपके साथ है, वह आपकी कौन है ?"
        "इंस्पेक्टर मुझे टोको नहीं।  मेरे कुछ क्षण ही मेरे पास हैं।  मुझे बात कह लेने दो।  हाँ ! तो यहाँ आकर मैंने दुसरी शादी कर ली।  अब जो मेरे साथ है वह मेरी दुसरी पत्नी है। संतान सुख मुझे कभी न मिला।  शादी तो कर ली पर खाने को एक भी दाना न था।  काफी दौड़-भाग करी काम खोजने के लिए, लेकिन कहीं काम न मिला।  बीमारी थी कि बढ़ती ही जा रही थी।   आखिर तंग आकर मैंने भट्टी के सामने बैठकर पकौड़े तलने का काम शुरू किया।  टी.बी. का मरीज और फिर आग के सामने बैठकर पकौड़े तलना दिनभर।  कब तक मैं भट्टी में पकौड़ों के साथ पकता ।  महीने भर में ही मैंने चारपाई पकड़ ली। खाने को तो था नहीं,फिर भला दवा-दारू के लिए पैसे कहाँ से आते।  मेरी पत्नी की उम्र अभी काफी कम है। होगी कोई बाईस-तेईस साल।  उस बेचारी को भी मैं कुछ न दे सका, सिवाए दुखों के।  उसकी आयु को देखकर मैं यही सोचता रहता क्योंकि मैं तो अब कुछ दिन का मेहमान था। लेकिन उसका पहाड़-सा जीवन और यह बेदर्द जमाना।  मुझे हर पल यह अहसास रहता कि मैंने इसकी जिंदगी बर्बाद कर दी।  मैं सब तरफ से चिंता में घिर चुका था। बहुत सोचा और आखिर हिम्मत करके मैंने अपनी पत्नी से कहा कि तू कहीं और चली जा, नयी शादी रचा ले, किसी और के साथ घर बसा ले।  यह सब सुनकर रोने लगी, न  मानी।  मैंने कई बार कहा, बार-बार  कहा, बहुत समझाया लेकिन यह कहीं भी न गई।  मैं और...और चिंता में घुलने लगा. उस समय तक अपने-आप को मुक्त महसूस नहीं कर सकता था जब तक कि मैं इसका कुछ इंतजाम न कर लेता।  यह चिंता ही है जिसने मुझे इस चिता पर ला पटका।  आखिर मैंने अपनी चिताओं का समाधान चिता को ही समझा।  मैंने तय किया कि अब मुझे अपना जीवन समाप्त कर लेना चाहिए। 
               ...और आज मैंने अपना छुरा उठाकर अपने सीने में मार लिया। यही मेरी सभी समस्याओं का समाधान था।  अब मेरी आखिरी इच्छा यही है कि मेरी पत्नी दुसरी शादी कर ले।   शायद मेरी मौत भी रुकी थी, चाहती होगी कि मैं अपना बयान देता जाऊं। इच्छा यही है। 
                कुछ समय बाद ही उसने अपने प्राण त्याग दिए।  मैंने आज जाना कि कोई क्योंकर आत्महत्या करने के लिए तैयार या मजबूर होता है - केवल उस स्थिति में जब उसके जीने में उसकी उसकी ज्यादा मौत हो और मरने में कम।   दर्दों, अभावों में जीने से कहीं अच्छा वह एक बार में  किस्सा खत्म करना चाहता हो।  मैंने आज जाना कि मानव नियति के हाथों कितना मजबूर और लाचार है। 
                        -------------------                  -सुरेन्द्र भसीन 




























परिस्तिथियाँ !

परिस्तिथियाँ !

जब बह जाती हैं
वक़्त की समुद्री लहर में...
तो उतरती लहर
छोड़ जाती है -
प्लास्टिक बोतलें,पॉलीथिन,अदखाई कचरा चीजें,
गाली-गलोच, सड़े-संबंध और उड़ती दुर्गंध...
तन और मन अगर साफ़ हो तो -
पुराना दुख-वैमनस्य मिटाकर -नया-साफ़
फिर कुछ कहने-बताने को,
एक-दूजे को अपनाने को,
नयी इबारत, नये संबंध सजाने को ।
       ---------------              सुरेन्द्र  भसीन 

Monday, July 31, 2017

औ ! पाषाण देह


(डॉ. नरेंद्र मोहन  की  कविता "पहली बार" के  परिपेक्ष्य में)

औ !
पाषाण देह ,
तुम्हें पहला क्षण-सा ही
अंतिम क्षण क्यों चाहिए ...  ?
प्रत्येक क्षण का सम्पूर्ण आनंद
तुम्हें क्यों नहीं  चाहिए ...  ?
शुरू कभी खत्म ही न हो ... ?
अगर नींद में हो तो
भोर ही न हो ... ?
सुबह का कलरव तो कतई न हो..... ?

सोचो अब
बदलाव से भय खाते
नीरसता में लुबडे(सराबोर) तुम्हें
पत्थर ही भाते हैं
पूरी तरह
थक-थम चुकी तुम्हारी सोच और शिराओं में
पत्थर ही तो पड़ते जाते हैं।
क्यों ?
अब पत्थर ही तुम्हें
प्रियजन नजर आते हैं।
           -------------                    सुरेन्द्र भसीन

देवात्माएँ

देवात्माएँ


दूर... सुदूर
नीले तारों भरे
आकाश में ही नहीं
देवात्माएँ हम-तुम में भी बसती हैं
किसी रंग-बिरंगे फूल-सी खिल जाने को 
आतुर, हमें, तुम्हें, इस जग को
महकाने को।
बस, ज़रूरत है तो
उन्हें प्यार से जगाने को...।
-------- सुरेन्द्र भसीन

देर हो चुकी थी - कहानी

"देर हो चुकी थी"   -    कहानी 
घर  के  दरवाजे पर एक भिखारी खड़ा न जाने कब से अलख जगा रहा था।  मैंने जैसे ही दरवाजा खोला, सामने एक फटेहाल भिखारी खड़ा था।  मैले-चीकट कपड़े, जो जगह-जगह से फ़टे थे,चेहरा काला पड़ा हुआ मानो किसी ने कीचड़ ही मल दिया हो मुँह पर,दाढ़ी और मूँछ बड़ी-बड़ी बिखरी हुईं, सिर के बाल भी खूब बड़े और आपस में उलझे हुए, पाँव फ़टे हुए, पाँव की उँगलियों में बिवाइयाँ पड़ी हुईं, जिनसे खून निकल-निकल कर उँगलियों पर जम चुका था और उस पर चिपटी गर्द...उफ़ ! देखते ही जी मिचलाता था। 
मैं एकटक  निहारती रही उसको। जैसे ही मैं कुछ लेने के लिए अन्दर मुड़ी ही थी कि अचानक दिल जोर से धड़का।  मुझे कुछ शक हुआ।  वापस मुड़ी और देखते ही भौंचक्की रह गई।  अनजानी शंका से दिल कांपने लगा और सिर भी चकराने लगा।  और... और न जाने कब मैं दीवार का सहारा लेकर वहीं दहलीज में बैठ गई। 
           थोड़ा पहचानने पर प्यार आँसू बनकर उमड़ने लगा।  रुँधे गले से -
"भइया !यह क्या कर लिया तुमने ? देखो क्या हाल बना लिया है अपना।"
वह गुमसुम खड़ा रहा। चुपचाप सिर झुकाए मूर्ति बना। मैंने फिर कहा -"भइया ! तुम वापिस आ जाओ।  हम कुछ न कहेंगे। "
मैं उसे आशामयी आँखों से निहारने लगी। उसके जवाब का इंतजार करती।मैंने फिर कहा -"सोना मिल गया था। तुम्हारे जाते ही।  मेरे लिए नहीं तो अपने बूढ़े बाप का तो ध्यान करो। "
         बापू के नाम पर वह थोड़ा विचलित हुआ लेकिन फिर रोष भरे स्वर में बोला -"भाई ! कैसा भाई ? अब मैं किसी का भाई, किसी का बेटा नहीं रहा।  अब तुम सब कुछ भूल जाओ।  सोना मिल गया था तो अच्छा हुआ और अगर नहीं मिला तो मुझे जी भर कर कोसना लेकिन विश्वासघाती न समझना। " इतना कहते-कहते ही एकबारगी उसका स्वर भर्रा गया।  फिर वह थोड़ा रुककर बोला -"अब मैं सन्यासी हूँ, एक भिखारी हूँ।  भाई को भूल जाओ।  भिक्षा मिलेगी ?"
            मैं सिर झुकाए सब कुछ सुनती रही।  फिर जैसे नींद से चौंकी, अनजाने में उससे आंखें टकरा गईं।  उसकी आंखों में रत्ती भर भी पश्चाताप न था।  इस हालत में भी वह आत्मिक शांति से परिपूर्ण नजर आया।  मैं फिर सिसकने लगी और उसने चुप्पी साध ली..... निर्विकार चुप्पी।  मुझे लगा मानो समय रुक गया हो  और वह  युग-युगांतर से मेरे सामने ऐसे ही खड़ा हो सिर झुकाए, अनवरत लगातार..... 
                 आख़िरकार मैंने उसे रोटियाँ लाकर दीं, जो उसने निर्विकार भाव से ले लीं।  मेरे सामने ही खानी शुरू कर दीं।  वह रोटी खाता रहा और मैं उसे देख-देख कर रोती रही।  वह उठा, बिना कुछ बोले मुड़ा और चला गया।  मैं आँखों में आँसू लिए दहलीज पर बैठी उसे जाते देखती ही रह गयी। 
मेरी यादें उमड़ती-घुमड़ती आंसुओं के रूप में काफी पीछे चली गईं। 
               जब माँ की मौत के बाद भाई उदास-सा रहने लगा।  न  अधिक कुछ खाता  और न ही  अपने शरीर का  ही  ध्यान रखता।  चुप रहना तो उसकी प्रकृति ही थी।  कुल मिलाकर दशा दुखदायी हो गई थी।  बूढ़ा बापू पत्नि की मौत  और बेटे की हालत, भला दो वार कैसे सह सकता ? उसने भाई को मेरे साथ भेज दिया कि वह कुछ काम ही सीख जायेगा।  मेरे पति का सोने का काम था और अच्छा चल रहा था। 
         भाई का दिल धीरे-धीरे  काम में रमने लगा।  उसकी चुस्ती व  स्फूर्ति  फिर से  लौट  आई। एक  बार  तो ऐसा  लगा कि  मानो वह  माँ की  मौत  का दर्द  भूल  गया  हो। 
    एक दिन वह बहुत जल्दी ही दुकान से लौट आया।  काफी घबराया हुआ था।  उसका सिर शर्म से झुका हुआ था आँखों में आँसू छलछला रहे थे।  मैंने पूछा -"रज्जी ! क्या बात है ? बहुत परेशान हो?"
उसने मुँह बिगाड़ा।  घबराई आवाज में बोला -"कुछ भी तो नहीं। "
मैंने फिर प्यार से पूछा -
"जरूर कुछ बात हुई है। क्या उन्होंने कुछ कहा है ?"
मेरे इतना कहते ही वह फट पड़ा।  सिसकियों में बोला -"मैं दुकान पर बैठा सोना काट रहा था कि हथोड़े के वार से सोना उड़ गया।  मैंने बहुत ढूंढा, लेकिन नहीं मिला।  जीजाजी यही समझते हैं कि मैंने सोना चोरी कर लिया है।  मुझे सबके सामने डाँटा और धक्का देकर दुकान से बाहर भी निकाल दिया। "
     मैंने उसे प्यार से समझाना चाहा -"उन्हें मैं समझा दूंगी ! कि हमारा रज्जी ऐसा नहीं है। " पहले तो वह मानने को तैयार ही न हुआ।  वापस बापू के पास जाने की जिद करने लगा।  मैंने उसे काफ़ी देर तक समझकर यहीं रहने को राजी कर लिया। 
     शाम को इनके आने पर मैंने इन्हें समझाना चाहा।  वह मुझ पर ही बिगड़ने लगे।  बात बढ़ गई।  उन्होंने मुझे भी खूब पीटा और रज्जी बाहर बैठा रोता रहा।  मुझे पीटने का इतना दुख न हुआ जितना रज्जी की सिसकियों का।  मैं रज्जी के टूटे दिल के बारे में जानती थी।  उसकी भावना को समझती थी कि कौन भाई, अपनी बहन का घर उजाड़ना चाहेगा।  ऐसी स्थिति में वह कोई गल्त कदम न उठाए, इसकी मुझे चिंता होने लगी। 
            उनके जाने के बाद मैंने तरीके-तरीके के उसे फिर समझाया।  वह जल्दी ही समझ गया क्योंकि शायद उसे मेरी स्थिति का भी आभास हो गया था।  मैंने कहा -"रज्जी हम दुकान पर फिर ढूंढेंगे। सोना जरूर मिल जायेगा। "

एक दिन,दो दिन और इसी प्रकार पूरा सप्तह बीत गया।  हमने बहुत ढूंढा लेकिन सोना नहीं मिला।  इसी बीच भाई ने रोटी खानी कम कर दी।  मैंने उसे समझाया पर वह नहीं माना।  एक दिन मैं घर पर नहीं थी।  मैं जैसे ही घर आई, वह कुछ पी रहा था।  मुझे देखकर उसने गिलास को छुपाना चाहा।  मैं उसे घूरने लगी।  उसने आँखें नीची कर लीं।  मैनें उसके हाथ से गिलास छीन लिया।  गिलास देखते ही मैं सकते में आ गई। उसमें पिसी हुईं लाल मिर्चें थीं। पानी के साथ घोल बनीं हुईं। मैं क्रोध और सहानुभूति से जल उठी
      मैंने लगभग चीखती हुई आवाज में कहा - "भइया यह क्या है।  मिर्चें क्यों पीते हो ? क्यों मारना चाहते हो अपने आप को ? बापू को मैं क्या मुँह दिखाऊंगी ?"
       वह चुप रहा।  उसकी चुप्पी से मैं निराश हो गई।  फूट-फूट कर रोने लगी।  कभी अपने को कोसती तो  कभी अपने भाग्य को। 
            फिर वह वहाँ से चला गया।  और फिर न लौटा।  शाम को इन्होंने बताया कि सोना मिल गया है लेकिन अब बहुत देर हो चुकी थी.... 

                  आज दस वर्ष बाद वह जिस हालत में मुझे मिला/लगता है शायद कभी न मिलने के लिए। 
                   ---------------                                  सुरेन्द्र भसीन  





























Friday, July 28, 2017

रुपये कहाँ से लिए - कहानी

 "रुपये कहाँ से लिए "   कहानी 

काली ने  जैसे ही अपना हाथ बर्तन में मारा, गोंद खत्म थीवह उसी समय गोंद लेने चल दिया। 
           काली सोचने लगता है -"ये लाला भी बहुत चोर है। जब जाओ काम नहीं है।  उसका एक-सा जवाब होता है।  कभी मिन्नत-खुशामद करने से काम देता भी है तो मजदूरी कम।  ऊपर से मंहगाई इतनी है कि कुछ मत पूछो ! पहले दो-ढाई रुपए बच जाया करते थे।  अब मारा-मारी करने पर भी डेढ़-दो रुपए ही बचते हैं। "
            इन्हीं विचारों में गुम काली लाला की दुकान पर पहुँच जाता है। लाला ने उसे आड़े हाथों लिया - "क्या है ?"
संक्षिप्त उत्तर  - "गोंद। "
"अभी कल ही तो ले गया था न ! फिर खत्म कैसे हो गई ? अच्छा देता हूँ। "
काली फिर विचारों में गुम हो जाता है  - "ये लाला क्या समझता है। गोंद मैं पीता हूँ।  ह्र समय लाला का दिमाग चढ़ा ही रहता है।  दिनोंदिन लाला कई तोंद बढ़ती ही जा रही है। "
"ये ले गोंद ! अब दो दिन से पहले नहीं मिलेगी, कहे  देता हूँ। " लाला का कर्कश स्वर काली को दुकान पर खींच लाता है। 
"खत्म हो गई तो ?"
"कम  लगाया कर न ! जबान चलाता है।  अजीब छोकरा है।  काम  दो तो  मुसीबत, न दो तो मुसीबत।  आकर खड़े हो जायेंगे भिखमंगों की तरह। "
लाला का चुभता स्वर, जाते-जाते भी काली के कानों में पड़ कर उसे भेद ही गया।  काली चुप।  अनसुना करते हुए।  अपने कदम घर की ओर बढ़ा देता है। 
    घर आकर काली लिफाफे बनाना शुरू कर देता है।  विचारों के बादल फिर घुमड़ने लगे हैं - "ये  माँ भी क्या चीज़ है। जब से बापू घर छोड़कर गया है, माँ तो मानों पत्थर ही हो गई है।  आज  छ: महीने होने को हुए।  मैंने उसके मुँह पर मुस्कान तक नहीं देखी। अंदर  ही अंदर घुलती जाएगी, पर बताएगी कुछ नहीं।  कमजोर इतनी हो गयी है कि कभी-कभी तो उसे चककर भी आ जाते हैं।  चेहरे पर मुर्दनी ही ज़मी रहती है हर वक्त।  मुझे अब वह प्यार भी नहीं करती पहले जैसा और न गुस्सा ही।  उसकी चुप्पी ही पूरी सजा है मेरे लिए। काम छोड़ने को कहूँ तो  कोई  जवाब  नहीं देती।  कई बार कहा मैं बड़ा हो गया हूँ। तुम आराम करो, मैं काम करूँगा।  सुनती ही नहीं।  जो मिलता है महीने भर में खत्म हो जाता है।  कभी उसने यह नहीं सोचा कि कभी वह या मैं बीमार ही हो जाएं तो दवा कहाँ से आएगी ! आजकल तो बिना पैसे के मिट्टी भी नहीं मिलती। "
           माँ के बीमार होने की कल्पना ही काली को काम करने की शक्ति प्रदान करने के लिए काफी है।  उसके हाथ और तेज चलने लगते हैं।   विचारों की कड़ियाँ फिर जुड़ीं  - "माँ को नहीं मालूम कि मैं यह काम करता हूँ।  अगर पता चल जाए, तो पता नहीं उसे कैसा लगे ? यह जानकर वह दुखी होगी या खुश  यह पता लगाना भी तो मुश्किल है।  इसलिए तो डरता हूँ, बताता नहीं।  हर समय मन अनहोनी शंका से कांपता रहता है।  मन में न जाने क्यों डर बैठ गया है। "
        दरवाजे की खडख़ड़ाहट से काली की तंद्रा भंग हो गई।  माँ आ गई।  वह बौखला गया।  जल्दी-जल्दी सामान छुपा कर दरवाजा खोलता है।  माँ थकी-हारी अंदर आई।  चेहरे पर मुर्दनी अधिक गहरी है।  आते ही रोटी बनाना शुरू।  काली चुपचाप रोटी बनाती माँ को देखे जा रहा है।  धीरे-धीरे चलते हाथ।  निराशा व थकान से टूटा मन व तन।  रोटी बन गई।  माँ की उदास आँखों के मौन निमंत्रण को काली ने समझा।  वह माँ के पास आ बैठता है।  माँ ने रोटी परोसी।  काली रोटी खाने लगा।  सब कुछ धीरे-धीरे यन्त्रवत निस्तब्धता में खोता जा रहा था।  न खाने वाले को खुशी  या खाने की इच्छा और न खिलाने वाले में चाव या उमंग।  सब कुछ मानो जबरदस्ती हो रहा हो।  काली दो कौर खाकर ही उठ गया, क्योंकि मन की रुलाई से आँखों में आने वाले आँसू उठने को मजबूर कर देते हैं। 
           रात को बिस्तर पर फिर काली के मस्तिष्क में विचार श्रंखलाबद्ध होकर आने लगे - "माँ ने आज रोटी नहीं खाई।  ज्यादा चिंता में लगती है।  वह माँ से पूछे भी तो क्या ? उत्तर की आशा नहीं की जा सकती।" एक बारगी वह माँ को नजदीक सोए हुए महसूसने की चेष्टा करता है।   "कुछ बात है जरूर जो माँ को खाए जा रही है। मगर बताती नहीं। कई बार पूछा। उसके आगे रोया भी।  हर बार की तरह चुप्पी ही उसका उत्तर, वही मुर्दनी चेहरा, सूनी आंखें। "
         अब तो उसे भी अधिक बोलना अच्छा नहीं लगता।  कोई फालतू प्रश्न करे।  वह झुँझला उठता है। उसकी आँखों में नापसंदगी की झलक साफ़ सामने वाला देख लेता है। 
                    सुबह का समय।  माँ अभी सोई है।  सिर पर कपड़ा बंधा है।  काली हैरान, आज पहली बार माँ से पहले उठा है।  वह सामने पड़े ड्रम पर बैठ गया।  इस समय उसकी आंखों के आगे सोई हुई माँ है, जो नींद में भी परेशान लगती है।  बार-बार  अपना सिर दबाती, हाथ-पाँव पटकती हुई।  काली सोचता है - "थक भी तो बहुत जाती होगी।  सुबह से छ:-सात  घरों के काम करना आसान बात नहीं। "
   लगभग दस-बीस मिनट यूँ ही बीत गए।  माँ जाग गयी।  काली ड्रम से उठकर माँ के पास आ बैठा। 
 "क्या बात है माँ ?  क्या तबीयत खराब है ?" 
माँ पूर्ववत मौन है। 
काली माँ की बाजू छूकर देखता है। 
        "तुझे तो बुखार है।  आज काम पर नहीं जाना।  मैं चाय बना दूँ ?"
काली चूल्हे पर चाय का पानी चढ़ाकर माँ के पास आ बैठा।  माँ की आँख के कोर उसे भीगे-भीगे से जान पड़े।  वह सिर झुका लेता है। 
   काली लगातार जमीन कुरेदे जा रहा है।  माँ उसे बिना पलक झपके देखे जा रही है। वह नजर उठा कर देखता है।  माँ ने आँखें चुरा लीं।  दोनों के बीच बनी लगातार चुप्पी दोनों के दिलों में अपराध भावना का विकास कर रही है। 
            चाय  भी बन गई, टूटे कपों में काली चाय डालकर, एक कप माँ की ओर बढ़ा देता है।  अपनी चाय जल्दी-जल्दी सुड़क  कर माँ की जगह काम पर निकल पड़ा।  
काली यह सोचकर दुखी है कि माँ ने चाय नहीं पी।  काली की आँखों में अनायास ही आँसू आ गए।  इस तरह माँ ज्यादा दिन चलने की नहीं, यह काली अच्छी तरह जानता है।  लेकिन वह क्या करे यह उसे समझ नहीं आता।  दिनोंदिन अंधेरी गुफा में दोनों धंसते ही जा रहे हैं।  कहीं भी रोशनी की कोई किरण नहीं।  क्या यह रास्ता किसी की मौत पर खत्म होगा, यह भी काली नहीं जानता। 
रात को काली घर पहुँचा।  माँ बेसुध पड़ी है। बुखार काफ़ी तेज़।  काली घबरा जाता है।  आज फिर माँ ने सारा दिन कुछ नहीं खाया।  वह अपने लिए भी कुछ नहीं बनाता।  जमीन पर ही टूटी चटाई बिछाकर पसर जाता है।  
आज काली भी उदास है।
वह सोचने लगता है - " क्या करे वह ! कहाँ जाए ? कभी तो दिल करता है कि अपना सिर पीट ले या  जोर-जोर से रोए। " उसकी बड़ी बेबसी है। 
इसी तरह सोचते-विचारते  घंटा बीत गया।  काली की तन्द्रा माँ की क्षण-प्रतिक्षण तेज होती कराहटों से भंग हुई।  बुखार बढ़ता ही जा रहा है।  काली की चिंता भी बढ़ रही है।  वह माँ की बीमारी का जिम्मेवार भी अब खुद को समझने लगा है क्योंकि न वह बीमारी के बारे में सोचता और न माँ बीमार ही होती। माँ की कराहटें अब ओर तेज हो चुकी हैं।  वह जल्दी से अपना खजाना निकालकर गिनता है।  लगभग साठ रुपए।  काली फुर्ती से जाकर डॉक्टर बुला लाया।  डॉक्टर ने आकर दवा दी।  अपनी फीस पच्चीस रुपए लेकर चला गया।  काली की सोच में एक क्षेत्र की वृद्धि हुई।  पहले सोचने का केंद्र माँ थी।  अब माँ, बीमारी  और  अपनी  महीने भर की कमाई की काली को चिंता हो आई है।  शरीर से चाहे उसने पच्चीस रुपए अपने से अलग कर लिए हों लेकिन मन ने फीस अदा मजबूरी में ही की। 
            काली सारी रात जागता रहा।  घंटे-घंटे बाद माँ को छूकर बुखार का अंदाज लगाता रहा। 
        अब सुबह हो चुकी है।  माँ को आराम है। बुखार के साथ काली की चिंता भी कम है।  
नींद खुलते ही माँ पूछती है -"रुपए कहाँ से लिए ?"
काली थोड़ा मुस्कुराता है।  सोचता है - " माँ बोली तो सही। "
काली को चुप देखकर माँ के चेहरे के भाव बदलने लगे  हैं। काली  यह देखकर घबरा जाता है। 
वह माँ को लिफाफे बनाने की बात कहता है। 
              काली, माँ के चेहरे के भाव पढ़ने की चेष्टा करता है।  माँ की आँखें बंद हैं।  दोनों आँखों से एक-एक आंसू गालों पर ढुलक  चुका है।  होंठ इस अंदाज से फैले हैं मानों मुस्कुरा रहे हैं। 
           काली हर बार की तरह इस बार भी नहीं समझ पाता कि माँ को इससे प्रसन्नता पहुँची है या दुख हुआ है। 
                           ------------                        सुरेन्द्र भसीन