Wednesday, September 9, 2015

मर्जी से

आदमी अपनी मर्जी से
कुछ भी करे, कहीं भी रहे 
बड़ा सुख-संतुष्टी पाता है। 
और वहीं उसे किसी मजबूरी में, जिम्मेवारी में,
किसी बंदिश में, आदेशों के तहत कुछ करना पड़े, कहीं रूकना पड़े 
तो बड़ा  असहज  महसूस करता है ,छटपटाता है, पीड़ा पाता है। 

बेतरतीब आकाश

करीने से
सलीके से 
सजाकर रखी गई चीजों में 
एक गहन शांति होती है
जैसे कतार लगाकर
स्कूली बच्चों का बस से उतरता कोई समूह। 

मगर आकाश में तारों को प्रकृति ने
न जाने यों क्यों नहीं लगाया है ?
उल्टा ऐसे फैलाया है जैसे हादसे में 
टूटे हुए काँच का बेतरतीब फैला किसी के अरमानों का चकमक चूरा। 

जिसे हाथ में लग जाने के भय से 
कोई सकेर नहीं पाता है 
और टूटे बिखरे कतरा-कतरा दिल को 
यूं ही बेकार समझ छोड़ फलाँग कर
हर कोई निकल जाता है। 



तुम्हारे अवसर


यह सही है 
इस भरे पूरे जहान में 
अनगिनत गतिविधियाँ पूरी होने को हैं तो 
असंख्य अधूरी भी बच रही हैं वक़्त की बाट जोहती
चुनौतियाँ बनीं तुम्हारे लिए।  
मगर तुम्हारे योग्य काम तो तब आयेगा 
जब यह जहान चाहेगा याकि तुम नहीं। 

वैसे तुम, 
कमान पर सधाये जाने वाले एक तीर ही हो याफिर
वक़्त पर काम आने के लिए 
हालातों की चादर फटी चादर पर लगाई जाने वाली 
महज एक कामचलाऊ पैबंद
जैसाकि कार्तिकेय था अपने समय में देवताओं के लिए याफिर
नहुष था इंद्र के सत्ताच्युत, पथभ्र्ष्ट हो जाने पर। 

  
तब नियति की मार से बौखलाए तुम में 
आया मौका ही तुम्हारा भाग्य या दुर्भाग्य होगा जोकि 
तुम्हें उठायेगा कार्तिकेय की तरह पूजनीय बनायेगा याफिर 
वासना-घमंड में डुबाकर सर्पयोनि में पहुँचायेगा 
बाकी जीवन रेंगने के लिए, 
यह तो तुम्हारा 
किया जाने वाला कर्म ही बतलाएगा।
















Saturday, September 5, 2015

अधूरे हम

सब जगह 
सब कुछ पूरा क्या ?
अधिक ही है रखा हुआ,दिया हुआ 
ईश्वर और प्रकृती ने हमारे लिए
अपने हिसाब से।  

मगर चाहतों,वासनाओं की भीतरी गड़बड़ी-हड़बड़ी में 
तो ये सब हमें कम व अधूरा लगता है
पूरा नहीं जान पड़ता है। 

वरना, सूर्य की रश्मियाँ
उफनते सागर की विद्युत शक्तियाँ
ये पानी के लगातार बहते झरने
ये दिनोदिन उपजती वनस्पतियाँ 
ये पहाड़ व खनिजों के भंडार 
और पृथ्वी की अथाह लम्बाई-चौड़ाई
यानि प्रकृती के सभी अकूत-अक्षत खजाने 
चैन से,बाँट कर खाने भर से भला
कम पड़ जाने वाले हैं ?
खत्म हो जाने वाले हैं ?

अच्छा हो अपने अंदर की 
भूख को, घबराहट को, रीतेपन को 
वस्तुओं से नहीं सय्यम में समेटो। 




















Friday, September 4, 2015

पाप-पुण्य के नतीजे

तुम कहीं भी रहो 
और चाहो या न चाहो, 
तुम्हारे कर्मों से उपजे पाप-पुण्य के प्रभाव अनंत तक 
करते हैं तुम्हारा पीछा - 
अपना बदला चुक जाने तक -
याफिर आत्मा निर्लेप,रंगहीन,भारहीन,तरल-सरल हो जाने तक।
चाहे अभी तुम गगन में उड़ते उन्मुक्त पंक्षी हो,
चाहे वन में विहार करते सिंह हो या उसके शावक,
चाहे सरकारी वायुयान में ठसके से चलते कोई 
देवी-देवता समान राजनेता।
अगर ये तुम्हारे पुण्यों का फल है तो 
किए गए पाप की छायाएँ भी कहीं समीप ही हैं
अपनी बारी का इंतजार में  डोलतीं -भट्कतीं। 
जो अनजाने में सतायी गयीं चींटी के श्राप से भी निकल-उभर ले सकतीं हैं तुम्हारे वृहद भीमकाय पाप का आकार और 
यकायक तुम्हें लील लेती है शनि की छाया बनकर 
या फिर राहु-केतु का प्रभाव बनकर।  

कर्मों की गति के प्रभाव में 
सब होता और बदलता जाता है लगातार...... । 

इसलिए कुछ भी करने से पहले 
ऊपर आकाश से धरा पर गिरने के प्रभाव को आंको,
और भविष्य में अपनी दुर्गति के अहसास में झांको । 














जीवन की परिभाषा

हे वैजानिकों!
इस धरती पर 
मौजूदा आकारों-प्रकारों व अनुभवों के परिपेक्ष्य में 
उपजी जीवन की परिभाषा के अनुसार ही 
तुम पूरे ब्रह्माण्ड में फैले ग्रहों एवं उपग्रहों पर 
जीवन का तुम करते हो खोज व विचार 
और इन्हीं सीमाओं में बंधकर (घेरे में )
हमारा विजान भी फंसकर हो गया है लाचार।    

मगर हमारी पृथ्वी पर जीवन की परिभाषा पर 
नहीं टिका है समूचा ब्रह्माण्ड, जैसेकि 
बर्तन में झांकने से पानी भरे बर्तन के मुहाने
जितना ही सूझता-दिखता है आकाश 
और तुम उसे सिर्फ उतना ही मानकर
चलते-करते हो सदा गौण व्यवहार लगातार। 

वस्तुतः  इस ब्रह्माण्ड की विशाल काया की नियति पर टिका है
इस नन्हीं-सी धरती के जीवन का सूक्ष्म आधार। 
अगर आगे जाना है  क्षतिजों  के पार तो 
इससे बड़ी ब्रह्म व्यवस्था को टटोल-टटोल कर निकालो 
और बिना शरीर वहां पर जीने का कोई रास्ता निकालो 
वरना, 
इस धरती पर रहो और 
धरतीवासियों का जीवन सम्भालो। 
















Wednesday, August 26, 2015

"अंधकार के किले में उजाले की सेंध " भूमिका


"अंधकार के किले में उजाले की सेंध "   
नयी, आज की, अधुनातन,प्रश्नाकुल, दव्न्दात्मक आध्यात्मिकता इन कविताओं की आधारभूमि है।  सतर्क आस्तिकता है।  ऐन आज के व्यक्तित्व के तनावों, अस्तित्व के चहुंओर से घिरे होने के संकटों में वह किस का सहारा ले, किसे पुकारे -  उस की असहायता निःसहायता को दिनोंदिन गहराते जाने वाले वैश्यिक हिंसात्मक क्रम सामने हैं।  व्यक्ति इन के सामने हतप्रभ है।  

एक बिल्कुल नया, उभरता युवा स्वर।  अपनी औघड़ता में भी सुडौल ज्ञानात्मक संवेदना की सघन पहचान करातीं कविताएँ मानवीयता का भरोसा कहीं भी शिथिल नहीं होने देतीं। संबोधात्मक भावावेगी और कहीं विचारशमित गंभीर मुहावरा पाठक को अपने में बाँधने की ताव भी बनाये रखता है। 

अंध-आस्था और विचारान्ध नास्तिकता के मध्य स्वानुभूत तलाशी-आजमायी आस्तिकता बड़ी अश्वस्तकारी है। युगों पुरानी, तही-बनी, परम्परित-हस्तांतरित होती आयी पूजा-पद्ध्त्तियोँ तक को       की वैज्ञानिक तर्कना पर कस कर अपनाती-उपलब्ध करती जागृत विवेकशीलता हमारा-पाठक का विश्वास जीतती प्रतीत होता है :-
 " यूँ न उठो

पूजा से झटपट कि

जैसे साबुन से धोने थे हाथ

सो तुमने धो लिये

और  हो गया बीती रात तक किये गये गुनाहों का प्रायश्चित। 

रोज पूजा में आना

उसे आत्मा की शुद्धि का मन की शान्ति का हिस्सा बनाना 

तुम्हारी सिर्फ देन्दिनी  ही नहीं तुम्हारी आत्मा की जरूरत है,

 ऐसा जाने कि देह का आत्मा  व आत्मा से ईश्वर का चाहे श्रण भर के 

लिये ही सही

आँखों का मिलना या प्रेमालाप या सम्पर्क तुम्हारी पूर्णता के लिये 

जरूरी है

जिससे तुम्हारे देह कलश में स्फूर्ति का ताजगी का पवित्रता का उतर 

जाना महज रस्म नहीं

तुम्हारी आने वाली और आ चुकी संतानों के लिये जरूरी है।"

                                                                       (मुक्ति की राह )
हर प्रकार की जड़ता, काहिली, लापरवाही पर भी बड़ी सूक्ष्म,तेज व्यंग्य प्रहार भी जगह-जगह मिल जायेगा, किंतु अपनापन और हितचिंतक भाव लिए हुए। 
वर्तमान में जीवन-अस्तित्व को भीतर तक प्रभावित करने वाले राजनीति,बाजार,अर्थाचार आदि को ले कर आज प्रचलित सोच-व्यवहार को भी पर्याप्त अवकाश-स्थान प्रस्तुत है।
आज के समांतर जीते हुए हजार उद्वेलनों, द्वन्द्वो, संकटों, संघर्षों में घिरे व्यक्ति के अंतः संवाद सरीखी शैली में तथा स्वयं ही स्वयं की आत्मशक्ति को पुकारती-जगाती मनुष्य की इयत्ता से साक्षात्कार कराती कविताएँ हैं। 
अज्ञात मनोवैज्ञानिक परिसरों के धुंधलकों, भयों, भ्रमों, तहखानों में जहां व्यक्ति बाहरी मारों हारों  में पिट कर पहुंचता है, वहां भी कवि सुरेन्द्र भसीन हार मानकर  पस्त होने के बजाय जीवन की दुर्दुष, दुर्वह आत्मशक्ति के बल पर उबर आने का छोर नहीं छोड़ता। उस की आत्मदृष्टि ही अध्यात्म दृष्टि और भगवत्ता है। 
इन कथनभंगी कविताओं में शब्द-पदों की आवृति अर्थ को खोल कर रखने से गूढ़ार्थ को स्पष्टतर करने की सुविधा जुटाती है। 
कहीं-कहीं किये गये मिथकीय प्रयोग भी आकर्षक हैं। 
अन्य सामाजिक संदर्भों की कविताएं हों या इतर संदर्भों की उन की पृष्ठ भूमि में उक्त चेतना की उजास सतत बनी रहती है।  गहन भारतीय पारिवेशिक आस्थाशीलता हर कहीं स्पंदित है। युवा कवि सुरेन्द्र भसीन मानव-निर्मित वर्तमान विराट अंधकार के किले में उजाले की, आध्यात्मिक विश्वास के बल पर, सेंध लगाने को तत्पर है ! स्वागत है ! 

                                                         बलदेव वंशी 
                                                    बी-684, सैक्टर 49,
                                               सैनिक कॉलोनी, फरीदाबाद 121001                                                       मो० 09810749703