Tuesday, December 3, 2019

सही है कि
बोलना तो
लोगों को नहीं आता
चुप रहना भी नहीं आता...
गलत वज़ह से गलत जगह पर चुप जो रह जाते हैं-
समाज में,पेशे में, सम्बन्धों में -
इसलिए पिछड़ जाते हैं/मात खा जाते हैं/
दब्बू, भीरू या डरपोक भी कहलाते हैं
अपनी बहन-बेटियों की रक्षा नहीं कर पाते
सड़क पर हुए हादसों को, हिंसा को, बलात्कार को
दूसरों के साथ हुआ बताते हैं
अपने साथ हुआ यह समझ नहीं पाते
गलत वजह/गलत जगह पर चुप जो रह जाते हैं
इसलिए अगला शिकार बन जाते हैं..
          ------           सुरेन्द्र भसीन

Sunday, November 17, 2019

मौत से पहले

सुना है
वक्त नहीं है किसी के भी पास...
शहरों में वक़्त ज्यादा तेजी से
बीता जा रहा है
लोगों पर बुढ़ापा भी
जल्दी आ रहा है
वक़्त तेजी से
जिस्मों को खा रहा है
आदमी अंदर तक भुरभुराता
छीजता जा रहा है
जल्दी ख़त्म हुआ जा रहा है।
अपनी मौत से पहले मरा जा रहा है।
         -----     सुरेन्द्र भसीन 

Tuesday, November 12, 2019

चाहतों के दायरे

पूरा ही नहीं पड़ता
कोई सा भी दायरा
चाहे कितना भी बड़ा ही
क्यों नहीं खींचें हम अपनी चाहतों का...
सदा बहुत कुछ
बाहर ही रह जाता है....और...
आखिर में अपने दायरे में आदमी
अकेले ही खड़ा रह जाता है
न हँस पाता है...
न रो पाता है...
अपने ही दायरे में सिमटा सिमटा
छोटा बिंदु हो जाता है...
     -----   सुरेन्द्र भसीन

सहजता

सहजता
धीमा बोलना
सहज बोलना
मधुर बोलना ही ठीक है...
मानाकि ऊंचा बोलना या
कर्कश शोर क्षण भर तो प्रभावित
कर जाता है
मग़र शीघ्र खत्म होकर किसी काम नहीं आता है।
धीमा बोलना
सबको भाता है
सच का दम रखता है
ह्रदयों में बस जाता है
लंबे समय तक काम आता है।
     -----    सुरेन्द्र भसीन

व्यक्तित्व

व्यक्तित्व
तुम
भीतर तक
दुख पाए हुए हो
जैसे दीमक खायी कोई लकड़ी...
ऊपर से साबुत दिखती
मग़र भीतर से तमाम खोखली...
वज़न नहीं उठा पाती
भुरभुरा कर टूट जाती...
तुम भी
ज़रा-सी तखलीफ़ में भरभरा जाते हो
बिखर कर
अपने ही ऊपर आ जाते हो
रुआंसे हो जाते हो...
     ----    सुरेन्द्र भसीन




Wednesday, November 6, 2019

कई कई बार
दृष्टि बस वही देखती है
जोकि हम देखना चाहते हैं
बुद्धि वही समझती है
जो हम समझना चाहते हैं
दो जमा दो आठ अगर
बैठ गया किसी वक़्त दिमाग में तो
चार फिर हो ही नहीं पाता है
अपनी इन्हीं जरूरतों-इच्छाओं को
जहन में समेटे गरीब
नेताओं के सम्मोहन के जाल में
तब फंस जाता है जब चुनाव में वायदों का
झुनझुना उसके कान में बजाया जाता है
और हर चुनाव के बाद
ठगे,अवाक से हम
यह नहीं झ पाते कि
हमसे हर बार हमारे ही विरूद्ध
षड्यंत्र कैसे कराया जाता है।
       ------     सुरेन्द्र भसीन

Tuesday, November 5, 2019

समायिक प्रश्न

मुझे
मालूम है कि
प्रदूषण की विकरालता से जब
पूरी धरती तबाह होने को आयेगी
तो तब भी 
पीछे बचे चंद नकारा नपुंसक राजनैतिक बुड्ढे जो अपनी डालों(पदों)
से चिपटे काँव-काँव करते और
एक दूसरे पर दोषारोपण करते
यह तय नहीं कर पायेंगे कि
यह सब किसकी वजह से हुआ?
...आज प्रश्न बड़ा यह है कि-
मुश्किल यह प्रदूषण है याकि
काँव-काँव करते यह काइयाँ निठल्ले बुड्ढे?
निवारण पहले किसका किया जाये?
बचना, बचाना हमको किससे है?
धोना/रोना हमको किसको है?
     ------           सुरेन्द्र भसीन