Tuesday, November 12, 2019

सहजता

सहजता
धीमा बोलना
सहज बोलना
मधुर बोलना ही ठीक है...
मानाकि ऊंचा बोलना या
कर्कश शोर क्षण भर तो प्रभावित
कर जाता है
मग़र शीघ्र खत्म होकर किसी काम नहीं आता है।
धीमा बोलना
सबको भाता है
सच का दम रखता है
ह्रदयों में बस जाता है
लंबे समय तक काम आता है।
     -----    सुरेन्द्र भसीन

व्यक्तित्व

व्यक्तित्व
तुम
भीतर तक
दुख पाए हुए हो
जैसे दीमक खायी कोई लकड़ी...
ऊपर से साबुत दिखती
मग़र भीतर से तमाम खोखली...
वज़न नहीं उठा पाती
भुरभुरा कर टूट जाती...
तुम भी
ज़रा-सी तखलीफ़ में भरभरा जाते हो
बिखर कर
अपने ही ऊपर आ जाते हो
रुआंसे हो जाते हो...
     ----    सुरेन्द्र भसीन




Wednesday, November 6, 2019

कई कई बार
दृष्टि बस वही देखती है
जोकि हम देखना चाहते हैं
बुद्धि वही समझती है
जो हम समझना चाहते हैं
दो जमा दो आठ अगर
बैठ गया किसी वक़्त दिमाग में तो
चार फिर हो ही नहीं पाता है
अपनी इन्हीं जरूरतों-इच्छाओं को
जहन में समेटे गरीब
नेताओं के सम्मोहन के जाल में
तब फंस जाता है जब चुनाव में वायदों का
झुनझुना उसके कान में बजाया जाता है
और हर चुनाव के बाद
ठगे,अवाक से हम
यह नहीं झ पाते कि
हमसे हर बार हमारे ही विरूद्ध
षड्यंत्र कैसे कराया जाता है।
       ------     सुरेन्द्र भसीन

Tuesday, November 5, 2019

समायिक प्रश्न

मुझे
मालूम है कि
प्रदूषण की विकरालता से जब
पूरी धरती तबाह होने को आयेगी
तो तब भी 
पीछे बचे चंद नकारा नपुंसक राजनैतिक बुड्ढे जो अपनी डालों(पदों)
से चिपटे काँव-काँव करते और
एक दूसरे पर दोषारोपण करते
यह तय नहीं कर पायेंगे कि
यह सब किसकी वजह से हुआ?
...आज प्रश्न बड़ा यह है कि-
मुश्किल यह प्रदूषण है याकि
काँव-काँव करते यह काइयाँ निठल्ले बुड्ढे?
निवारण पहले किसका किया जाये?
बचना, बचाना हमको किससे है?
धोना/रोना हमको किसको है?
     ------           सुरेन्द्र भसीन

Wednesday, October 23, 2019

अंदर से तो
आप समझते ही हैं कि आपके साथ क्या सही हो रहा है और
क्या गलत?
कौन सही कह कर रहा है और
कौन आपका सिर्फ मुँह धो रहा है? कौन वक्त पर काम आयेगा आपके
और कौन चला जायेगा
मुंह मोड़कर
बीच बियाबान छोड़ कर।
मग़र अहम में/तारीफ के
स्वाद में डूबे तुम उनसे
जो आप अपना पल्ला नहीं छुड़ाते हो तो कल यही तुम्हें काटेंगे आस्तीन के सांप बनकर
पद के मद में तुम्हें यह क्या नहीं सूझता?
कि आगे पश्चताप का बदबूदार नाला आने वाला है
जिसमें गिरकर तुम्हारा भूतकाल काला हो जाने वाला है।
         ------     सुरेन्द्र भसीन

Thursday, October 10, 2019

आँसू
तो राम की आँखों
में भी आये थे
सीता हरण के बाद।
जार जार भी रोये थे
लक्ष्मण मूर्छा के बाद।
व्यथित भी हो गए थे
अपने पिता के देहावसान के बाद।
तो क्या?
सब को संताप होता है
ये सभी कुछ होने के बाद...
मगर जीवन तो फिर भी चलता ही है
यह सब कुछ होने के बाद।
निर्मोही थे कृष्ण महाराज
क्षण भर में बिसार देते थे
यह सबकुछ होने के बाद।
      ------       सुरेन्द्र भसीन

Monday, October 7, 2019

उसने मुझे सिखाया
उसने मुझे समझाया
उसने मुझे करके भी बताया
मग़र मेरे समझ नहीं आया।
किंतु जब वो चली गई तो
उसके विरह के प्रकाश में
मुझे समझ आया कि
प्यार क्या है?
       -----     सुरेंद्र