Thursday, December 13, 2018

जिंदगी से बात

ऐ,
जिंदगी मेरी !
तुम हमेशा अपनी ही करोगी
या कभी कुछ
मेरी  भी  चलने  दोगी ?

जब-जब मैं
अपनी मर्जी की करना चाहता हूँ
तुम मेरे पिछले कर्मों या भाग्य के
रोड़े अटकाते हुए ।
हर बार मुझे
नाक़ामयाबी या मज़बूरी का
अंगूठा दिखती हो।

हर बार
जो भी नया होता है तुम्हारे दम पे
मुझे तो नहीं भाता।
किया तुम्हारा कुछ भी क़सम से
मन मार के ही स्वीकार लेता हूँ मानों
गर्मियों में दान में मिला कंबल।

सच कहता हूँ
अगर क्षण भी मैं
अपने को जी लूँ क़सम से
तो आज़ाद हो जाऊँगा इस भरम से कि- 
तुम मेरी अपनी नहीं हो, 
कसम से।
          -------------        सुरेन्द्र भसीन     
 

बड़ा प्रश्न

अपने से प्रश्न करना
इंसान  को नहीं आता है
दरअसल इंसान खुद से क्या चाहता है
यह उसे भी पता /समझ नहीं आता  है...

दूसरों की सुनने,मानने और कहने में ही
उसका सारा जीवन निकल जाता  है....

लोग क्या कहेंगे ?
यह अच्छा लगेगा या नहीं ?
जैसे फालतू जुमलों में फंसा इंसान 
अपने से ही पराया का पराया ही रह जाता है  
जैसे किराए के मकान में रहता रहे कोई याकि
समाजिक साहूकार का कर्जा चुका रहा हो जीवन भर....
कुछ भी कह लो -
मगर जीवन भर
वह अपने से कभी पूछ नहीं पाता है कि
दरअसल वह अपने से
क्या  चाहता  है ?
             -------------              सुरेन्द्र भसीन   

न सपने अपने न अपने अपने

अपनों 
से ज्यादा 
सपने कलपाते हैं,
जिंदगी भर दौड़ो 
फिर भी हाथ नहीं आते हैं

दिखते तो हैं पुराना रिश्ता हो जैसे
मगर आकाश में टिमटिमाते तारे
एकटक देखते रहो...
देखते रहो...
पलक झपकते ही
ओझल हो जाते हैं...
बेगाने हो छूट जाते हैं
फिर से बनाने/देखने पड़ते हैं
फिर से शुरू करो
नाराज़ रिश्तों को गाँठना
तारों सा टांकना..
जीवन भर करते रहो वरना
न जाने कब अपने ही सपने हो जाते हैं।
------               सुरेन्द्र भसीन          

Sunday, December 2, 2018

आज इंसान/ प्रकृति

आज इंसान
प्रकृति के निर्णयों से
सहमत नहीं हो पाता है,
उनके सामने सिर नहीं झुकाता है,
नतमस्तक नहीं होना चाहता है।

तो प्रकृति भी
इंसान के कृत्यों को कहाँ
वहन-सहन कर पाती है।

दोनों में दिनों-दिन
दूरियां बढ़ती ही जाती हैं।
इसलिए इंसान अगर प्रकृति को खाता है तो 
कभी प्रकृति भी
इंसान को लील जाती है।
         ------     सुरेन्द्र भसीन

Thursday, November 22, 2018

वैमनस्य

वैमनस्य

हमारी स्वयं की
मिट्टीकी, गुस्से की
गठानें ही होती हैं वैमनस्य।
न जानें कैसी रूकावटें,सलवटें हैं
यह हमारे व्यक्तित्व की
जो सरल जीवन प्रवाह को
करती हैं अवरुद्ध!
और प्रेम ऊष्मा पाकर
हो जाती हैं विभोर!
जैसे घी या बर्फ पिघलता ही जाता है
ताप पा..पाकर।
प्रेम प्रवाह के आवेग से ही
वर्षों से रुकी सम्बन्धों की नदियाँ
फिर ...फिर बह पाती हैं
वरना दुरुह चट्टाने
ही हो जाती हैं।
       ------   सुरेन्द्र भसीन

समाज हमारा

हम जिसे
प्रेम कहते हैं न!
बहुतों के लिए कुछ नहीं है
वासना के सिवाय...
जिम्मेवारी रहित भोगने की एक प्रक्रिया
उलीचना-उलटना मात्र...
दिनभर की समाज से इकठ्ठी हुई
सड़ांध उतारने का प्रयास...
क्या किसी काम आता है?
महज काई कीचड़ जमा काला बदबूदार पानी..
सामाजिक परनाले में बहने
आ जाता है...
संतान, औलाद कहलाता है
यूँ ही आने वाले
रीढ़ विहीन समाज का
निर्माण होता जाता है।
       -------    सुरेन्द्र भसीन

Tuesday, November 20, 2018

मरने से पहले

मरना तो
होता है हरेक को बारबार
चीख-चीख कर मरो या
मरलो बेआवाज़
मरो अपना अकेले या
मरो लोगों के ही लिए
लोगों के साथ...
अब कोई
कहर नहीं टूटता
न होती है कांच टूटने की तीखी ध्यानाकर्षक आवाज...
क्योंकि बाकी सब
अपनी जरूरतों-स्वार्थों में
मर चुके हैं पहले ही
कई कई बार...।
      -------    सुरेन्द्र भसीन. मरने से पहले