Thursday, December 13, 2018

न सपने अपने न अपने अपने

अपनों 
से ज्यादा 
सपने कलपाते हैं,
जिंदगी भर दौड़ो 
फिर भी हाथ नहीं आते हैं

दिखते तो हैं पुराना रिश्ता हो जैसे
मगर आकाश में टिमटिमाते तारे
एकटक देखते रहो...
देखते रहो...
पलक झपकते ही
ओझल हो जाते हैं...
बेगाने हो छूट जाते हैं
फिर से बनाने/देखने पड़ते हैं
फिर से शुरू करो
नाराज़ रिश्तों को गाँठना
तारों सा टांकना..
जीवन भर करते रहो वरना
न जाने कब अपने ही सपने हो जाते हैं।
------               सुरेन्द्र भसीन          

Sunday, December 2, 2018

आज इंसान/ प्रकृति

आज इंसान
प्रकृति के निर्णयों से
सहमत नहीं हो पाता है,
उनके सामने सिर नहीं झुकाता है,
नतमस्तक नहीं होना चाहता है।

तो प्रकृति भी
इंसान के कृत्यों को कहाँ
वहन-सहन कर पाती है।

दोनों में दिनों-दिन
दूरियां बढ़ती ही जाती हैं।
इसलिए इंसान अगर प्रकृति को खाता है तो 
कभी प्रकृति भी
इंसान को लील जाती है।
         ------     सुरेन्द्र भसीन

Thursday, November 22, 2018

वैमनस्य

वैमनस्य

हमारी स्वयं की
मिट्टीकी, गुस्से की
गठानें ही होती हैं वैमनस्य।
न जानें कैसी रूकावटें,सलवटें हैं
यह हमारे व्यक्तित्व की
जो सरल जीवन प्रवाह को
करती हैं अवरुद्ध!
और प्रेम ऊष्मा पाकर
हो जाती हैं विभोर!
जैसे घी या बर्फ पिघलता ही जाता है
ताप पा..पाकर।
प्रेम प्रवाह के आवेग से ही
वर्षों से रुकी सम्बन्धों की नदियाँ
फिर ...फिर बह पाती हैं
वरना दुरुह चट्टाने
ही हो जाती हैं।
       ------   सुरेन्द्र भसीन

समाज हमारा

हम जिसे
प्रेम कहते हैं न!
बहुतों के लिए कुछ नहीं है
वासना के सिवाय...
जिम्मेवारी रहित भोगने की एक प्रक्रिया
उलीचना-उलटना मात्र...
दिनभर की समाज से इकठ्ठी हुई
सड़ांध उतारने का प्रयास...
क्या किसी काम आता है?
महज काई कीचड़ जमा काला बदबूदार पानी..
सामाजिक परनाले में बहने
आ जाता है...
संतान, औलाद कहलाता है
यूँ ही आने वाले
रीढ़ विहीन समाज का
निर्माण होता जाता है।
       -------    सुरेन्द्र भसीन

Tuesday, November 20, 2018

मरने से पहले

मरना तो
होता है हरेक को बारबार
चीख-चीख कर मरो या
मरलो बेआवाज़
मरो अपना अकेले या
मरो लोगों के ही लिए
लोगों के साथ...
अब कोई
कहर नहीं टूटता
न होती है कांच टूटने की तीखी ध्यानाकर्षक आवाज...
क्योंकि बाकी सब
अपनी जरूरतों-स्वार्थों में
मर चुके हैं पहले ही
कई कई बार...।
      -------    सुरेन्द्र भसीन. मरने से पहले

Wednesday, October 31, 2018

बेटा

दूसरों की
ऊँची से ऊँची उड़ती पतंग को देखकर
तुम झुंझलाहट में
अपनी भी पतंग को
बेतहाशा तुनके लगाते जा रहे हो
नहीं जानते कि
कमजोर कमर की बनी तुम्हारी यह पतंग
ज्यादा तुनके नहीं झेल पायेगी और
न ज्यादा ऊंचा उड़ पायेगी....
तुम्हारी जिद से टूट कर
नीचे धराशायी जरूर हो जायेगी...
अच्छा हो इसकी क्षमता को समझ
कुछ कम ही उड़ा लो और
 इसे टूटने व टूट कर बिखरने से
बचा लो।
       ------       सुरेन्द्र भसीन

Tuesday, October 30, 2018

अनाम योद्धा

मैं
अपने आपको
एक बिन्दू से दूसरे बिन्दू तक
चलता हुआ देख रहा हूँ लगातार...
रोज बदलता हुआ
निरंतर सफ़र करता हुआ।
देह के एक बिन्दू से जीवन के विभिन्न बिंदुओं तक
रोज होती है मेरी यात्रा मग़र
मैं समानुपाती नहीं बढ़ पाता हूँ
 - कहीं थोड़ा तो कहीं ज्यादा,
   कहीं आगे तो कहीं पीछे होता जाता...
फिर-फिर कोशिश करता
अपना आंकलन खुद ही करता
घिसट-घिसट के ही सही
मग़र आगे बढ़ता
अपने से संघर्ष करता।
          -------        सुरेन्द्र भसीन