Thursday, November 16, 2017

शोर ...शोर ... और बस शोर है।

इस भीड़तंत्र में 
कोई भी नहीं है 
अपने भीतर बसा हुआ 
सभी तैश में,स्वार्थ में बौराये हुए 
सब तरफ जैसे टनटनाती घंटियों का ही 
शोर ...शोर ... और बस शोर है। 
एक-सी आवाजें   
लड़ती घंटियों की टकराहटें कर्कश 
सुनना नहीं चाहता कोई 
मगर आवाजें सब ओर हैं ....
नहीं टकराना चाहते 
रुकना चाहते हैं मगर 
रुक नहीं पाते हैं। 
आख़िरी में बाहर से 
बाहर ही विदा हो जाते हैं। 
     ------          सुरेन्द्र भसीन  

Monday, November 13, 2017

प्रकृति एक प्रेम गीत

एक बादल 
पानी का भरा हुआ
आकाश में मंडरा रहा था।
धरती के सूखे टुकड़े को देखकर
उस पर बरसना चाह रहा था।
मगर हवा के हिचकौलों में
मौका नहीं पा रहा था।
उधर धरती भी उसके इरादों से
नावाकिफ नहीं थी।
वह  भी आँखों ही आँखों से इशारे करते जा रही थी।
बादल अपनी चाह से उसे सराबोर करदे
ऐसा मन ही मन चाह रही थी।
पर कहती कैसे ?
समाज से जो शरमा रही थी,
अपनी भावनाएं कह नहीं पा रही थी।
फिर बादल ने मौका पाया और
नीचे गोता लगाया
अपना प्रेमजल धरती पर बरसाया।
धरती का तन भीगा,मन भीगा
उसके अंग-अंग में, रोम-रोम में अंकुर फूटे
यों धरती ने गगन का प्रेम है पाया।
              --------           सुरेन्द्र भसीन









दिमाग है पेपरवेट

यह जो 
दिमाग है न 
दिल का पेपरवेट है.....पेपरवेट। 
जब दिल लापरवाही में ज़रा फड़फड़ाना चाहता है 
तो दिमाग उसे सोच से दबाता है,
दिल कहीं फौरी सफलताओं से बोरा न जाये 
इसलिए बड़े बुजुर्गों की तरह इसे समझाता है। 
तुम यह करते तो यह हो जाता,
तुम वह करते या वहाँ पहुंच जाते तो वह हो जाता 
जैसे भारी भरकम जुमले 
लगालगाकर सदा उसे दबाता है। 
हंसने, जीने, जीत का जश्न मनाने के वक़्त भी 
उसे सीखों से रोता, कलपाता है। 
अच्छा  हो 
दिमाग के भी दायरे बांधो !
उसे कभी दिल कब्जाने मत दो,
दिल को दिल ही रहने दो उसे 
दिमाग बन जाने मत दो। 
         ---------    सुरेन्द्र भसीन 

Monday, November 6, 2017

आभागा मैं

अब तो
हर बार ही 
यह हुआ है कि मैंने 
जब-जब तुम्हें छुआ है 
तो मुझे 
पत्थर का अहसास हुआ है।  
हर बार तुम्हारी निराशा,चुप्पी, उदासीनता ही 
महज मुझ तक हस्तांतरित हो, 
मुझे भीतर से भारी कर जाती है।  
मैं जो जमाने भर से 
भर-भरा कर 
तुमसे बतियाने,लिपटने, खाली होने आता हूँ 
मगर उल्टा भारी बोझ होकर लौट जाता  हूँ।  
ऐसे बैरंग-अवश लौटा मैं 
परिस्थितियों से संघर्ष नहीं कर पाता हूँ 
जमाने को जवाब नहीं दे पाता हूँ।  
सहज नहीं रह पाता हूँ और 
दिनोदिन चिड़चिड़ा होता जाता हूँ
हार ... हारता ही जाता हूँ ....। 
मगर मैं 
कितना अभागा 
किसी को कुछ कह भी नहीं 
पाता हूँ। 
    ----------        सुरेन्द्र  भसीन            


Saturday, November 4, 2017

मुझसे पूछना महज दस्तूर था तुम्हारा 
करनी तो तुमने अपने मन की ही थी 
बातों में उलझाकर मुझको 
रखनी टांग मुझ पर ही थी 
बात अपनी मनवाने का 
यह तुम्हारा महज स्वांग ही था 

Wednesday, November 1, 2017

विज्ञान की सीख

विज्ञान ने
हमें समझाया है कि
देवी-देवता कुछ नहीं
एक साधारण इस्त्री-पुरुष ने हमें जाया है...
पाप-पुण्य भी बेकार है।
डांट-डपट,आर्थिकता और भय पर ही
टिका और चलता यह सारा संसार है।
लेन-देन यहीं तक है बस
आगे सब कुछ खत्म,
बड़ा वाला शून्य या निरा अंधकार है।
अब यह सीधा हिसाब
हमें समझ तो आता है
हमें लूट-खसोट,मार-काट की ओर ले जाता है
और आखिर में हमें
प्रयाश्चित के जलते-कल्पते
जंगल में छोड़ ही जाता है। 
          -----------              सुरेन्द्र  भसीन      


हम सारे पत्थर

सारे के सारे पत्थर
थोड़े न पूजे जाते हैं 
न ही तुम्हारी कामनाएं ही पूरी कर पाते हैं 
अधिकतर तो 
मारने के काम ही आते हैं या 
राह में पड़े फूटते-फोड़ते ही 
अपना जीवन बिताते हैं 
देवता नहीं बन पाते हैं किसी के लिए। 
पूजा के पत्थर तो स्थापित होते हैं आस्था से 
उन्हें फूंकना होता है मंत्रोच्चार से
मंदिर मेँ देवता स्वरूप बैठाना पड़ता है तभी 
फिर वह तिलिस्म हो जाते हैं 
भगवान की तरह 
काम आते हैं। 
तुम्हारी इच्छाएं पूरी कर पाते हैं। 
           -------         सुरेन्द्र भसीन