Friday, July 14, 2017

बंद आँखें नहाना

"बंद आँखें नहाना"

माना  मैंने 
कि तुम्हें किसी ने 
नग्न नहाते नहीं देखा 
पानी में डुबकी लगाते या फिर 
लोटा-लोटा नहाते ... 
मगर तुमने तो देखा है कि नहीं 
कई बार अपने आप को नहाते.... नहाते 
कैसा लगता है ?
किसी मजबूर से रिश्वत मांगते?
अपनी बीवी को बेवजह पीटते ?
नशे में किसी दूसरी को जबरदस्ती 
अपनी बांहों में भींचते ?
अपने माँ-बाप को 
खरी-खोटी सुनाते, 
उनकी अवहेलना करते,
उनको रोटी-कपड़े के लिए तरसाते और 
ऐसी ही अपनी तमाम गुस्ताखियों को 
खोखले, नीचता पूर्ण तर्कों से ढांपते...
सच !
क्या तुमने सचमुच 
कभी नहीं देखा 
अपने को नग्न -
क्रोध में, लालच में, वासना में 
डुबकी लगाते या लोटा-लोटा नहाते। 
नहीं देखा ! कभी नहीं देखा?
तो देख लो !
          -----------               -  सुरेन्द्र भसीन  

Wednesday, July 12, 2017

जीवन यात्रा

जीवन  में 
कई बार 
छिटक कर हम कहीं 
एक-दूसरे से दूर चले जाते हैं....
न  चाहते हुए भी 
बातों ही बातों में 
आपस में यूहीं टकरा जाते हैं..... 
जैसेकि पुरानी पड़ती गरारी के दांते घिस जाते हैं 
अटक नहीं पाते 
बिना वजह हम भी छिटक-छिटक जाते हैं.... 
तो पास रहते-रहते हुए भी 
कहीं भीतर से परे-परे हो जाते हैं.... 
नाक आड़े न भी आए तो 
बातों के किनारे ही जुड़ नहीं पाते हैं.... 
समझते हैं तो मान नहीं पाते 
मानते हैं तो 
न समझ बनकर ही अनदेखा करते जाते हैं...
अपनी जरूरतों की वजह से 
ज्यादा विलग भी नहीं रह पाते 
क्योंकि ग्यारह से घटकर एक जो हो जाते हैं 
इसलिए बार-बार लड़खड़ाते हैं ... 
फिर भी 
होता है कई बार कि हम 
 न चाहते हुए भी 
छिटक कर एक-दूसरे से 
दूर चले जाते हैं.... 
         -----------        - सुरेन्द्र भसीन 

Friday, July 7, 2017

बोलने-कहने से पहले

कुछ  भी 
बोलने-कहने से पहले 
ज़रा रूको 
दाएं-बाएं देखो 
सुनो-सोचो 
जैसा कि गाड़ी चलाते हुए 
करते हो हर बार 
कि कहीं टकरा न जाए
कि कहीं हादसा न हो जाए 
कि कहीं कोई मासूम-मजबूर 
नीचे न आ  जाए 
तुम्हारे अंहकार की गाड़ी के 
कि कहीँ पहिया न  चढ़ जाए 
किसी गरीब के पेट पर 
कि कहीं कोई सपना न टूटे 
अपना न छूटे 
बैठने को तुम्हारी इस बातूनी गाड़ी में ..... 
सामाजिक संकेतों का 
बड़े-छोटे का लिहाज दिखाकर, आदर दिखाकर 
समझ का हार्न बजाकर 
पालन करो अपनी 
परम्पराओं व परिपाटी का। 
बिना सोचे फैंककर बोलना 
बिना ब्रेक के 
गाड़ी ही होती है 
जिनके नीचे कुचल जाती  हैं। 
चाहतें व आशायें 
दंभ की टकराहट से 
हो जाते हैं कई नुकसान-हादसे 
इसलिए बोलने-कहने से पहले 
जरा रूको 
सुनो .... सोचो .... देखो .... 
जैसा कि 
गाड़ी चलाते हुए करते हो हर बार !
           ---------------          - सुरेन्द्र भसीन 





Tuesday, July 4, 2017

मेरा भाग्य

मैं  पूछता हूँ 
मेरे किये परोपकार 
क्या कभी मेरे काम न आयेंगे ?
और मेरे दिन 
बेरोजगारी और मुफलिसी में 
क्या ऐसे ही गुज़र जायेंगे ?
इस खारे समुद्र में 
यूहीं बिना किन्हीं साधनों के 
नाव ठेलते -ठेलते 
बिना चप्पू, बिना पतवार 
हवा और लहरों की मार झेलते-झेलते ?
मेरे कर्मों की फेहरिस्त में 
क्या गुनाह ही गुनाह बचें हैं बाकि 
जो मेरे दिन 
ऐसी अंधेरी खोह में 
बीतते जायेंगे ?
कब होगी सुबह ?
कब फूटेगी ?
आशा-परिवर्तन की किरण। 
कब बहुरेंगे (फिरेंगे) मेरे दुर्दिन ?
या जीना है मुझे 
अब बस 
टूटने की कगार तक 
किसी हादसे की इन्तजार में।  
     -----------           सुरेन्द्र भसीन 






Thursday, June 29, 2017

भूख

भूख

ये जो
पत्थर चला रहा हूँ न मैं
मेरा शौक नहीं
मेरी चाहत भी नहीं
मेरी बड़ी मजबूरी है।
ये फैंके पत्थर ही पाट रहे
मेरी रोटी और पेट की दूरी हैं।
कोई  करता रहे सियासत
तो कोई मानता रहे हमें बाग़ी
हम क्या करें?
हमारे लिए तो यह
बस जीने की मजबूरी है।
गोली से मरे हम
या मरे भूख से तड़पकर हम
हमारे लिए दोनों में से
तो बस एक चुनना जरुरी है।
बुरा न  मानों भाइयो
ये जो पत्थर चला रहा हूँ मैं और
तुम मुझ पर गोली
ये हमारा धर्म या देशप्रेम नहीं
हमारी दोनों भूखों
की मजबूरी है।
  ------------------                     सुरेन्द्र भसीन












भविष्य

भविष्य

भविष्य
जो अनिश्चित  है के बारे में
सोच-सोच कर घबराता हूँ
और जैसे भी, कैसे भी
उसे निश्चित कर
अपने काबू में कर लेना चाहता हूँ।

भला
जो अभी हुआ ही नहीं
उसे कैसे बाँध सकता है कोई
तय करके अपनी गिरह में ?

कितनी और कैसी भी
प्रार्थनाएँ...  या... मंत्र
मैं क्यों न रचूँ..... जपूँ ?

भविष्य तो
बेकाबू ही रहेगा....
क्योंकि,
जो कुछ हुआ ही नहीं
गिरह कैसे बाँध सकता है कोई ?
                ---------------         सुरेन्द्र भसीन













Wednesday, June 28, 2017

नियति

"नियति"

सदियों से
वह पहाड़ था
तो अड़ के खड़ा था
राह रोकने की अपनी जिद लेकर...
उसमें छेद कट, बारूद भरके उड़ा दिया
उसके बारीक़ टुकडों में तारकोल मिलाकर
सड़क बना दिया...
उसको!
 रास्ता बना
राहों में बिछा दिया!
------        सुरेन्द्र भसीन