Thursday, February 16, 2017

टूटे तुम

"टूटे तुम"

कुछ चीजें
तुम्हें खुद महसूस नहीं होतीं
लेकिन तुम्हारे भीतर फँसा दी जाती हैं
विरोध बनाकर
तुम्हारा क्रोध बनाकर।
और एक सुई सी बात से तिलमिलाकर
तुम हवा भरे
फुग्गे-सा फट पड़ते हो
भरी महफ़िल में एक दिन
एक खोखली ऊंची
बड़ाम ... के साथ
अपना कचरा करवाते,
हंसी उड़वाते,
अपनी ही बनावट
नकल के कारण
अपने वजूद से
ख़ारिज होते
अपनी ही नजर में
गिरते जाते....
----------          सुरेंद्र भसीन
   

Friday, February 10, 2017

नवजीवन

जब मैंने
जोर से चीख कर तुम्हें पुकारा
हालाँकि तुम मेरे सपने में नहीं
सपने से बाहर खड़ी थी
फिर भी, हड़बड़ा कर पूछ बैठी -
क्या हुआ ? क्या हुआ जी.....?
और मैं पसीने से तरबतर, बदहवास-सा
कि... वो मुझे लेने आये हैं,
देखो वो..... 
कौन ?कौन ? लेने आये हैं ?
और मैं होश  में,
सपने से बाहर अपने में होता हुआ......
कि अभी नहीं ? अभी नहीं ?
यूँ नहीं जायेगी मेरी जान
जब तक तुम हो मेरे पास,
मैं नहीं मर सकता।

फिर  भी
सपने में मैं
उस दरवाजे तक चला तो गया ही था एक बार.....
खोला नहीं मैंने  लौट आया 
मृत्यु का अनुभव लेकर
खुलता दरवाजा
तो लौट नहीं पाता
दूर...दूर परे ही निकल जाता
शून्य बन
शून्य में समाहित हो जाता।
                --------               सुरेंद्र भसीन        



Tuesday, February 7, 2017

नया विचार

कितना भी
कर लो प्रयास
चिकनी, लिपी-पुती दीवारों/कानों के भीतर
कुछ नहीं जाता....
तुम्हारा कहा, नये से नया विचार भी
दीवार पर गोबर पाथने
जैसा ही तो हो जाता है।
सूखने पर /पुराना हो जाने पर
शाम होते न होते
स्वयम ही लकड़ियां डालकर,
आग दिखाकर
उसको जब किसी भी प्रकार से
अपने घर से/ दिमाग से निपटाते हो....
तभी चैन से सो पाते हो।
                                      सुरेंद्र

Sunday, February 5, 2017

जानवर

मानों या
न मानों
इंसान भी ढूंढ़ता है मौका
एक उम्दा - खालिस
जानवर हो जाने का।
समाज की नजर के हटते ही
सदियों से सिखाई शिक्षा व तमीज
भूल जाने का।
अपनी शारीरिक भूख- हवस  मिटने के लिए
किसी को खा जाने का,
किसी को चाट जाने का।
शर्म, हया, दया, मोह, माया
और बड़े- बुजुर्गों का मान-सम्मान
सब पानी में घोलकर पी जाने का।
अपनी दैनिक जरूरतों के लिए
सब सीमाएं लांघ जाने का
एक उम्दा,खालिस
जानवर हो जाने का
इंसान भी ढूंढता है मौका.......

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सुरेंद्र                                

Monday, January 23, 2017

lttu-lttaee

तू मेरा लट्टू
मैं तेरी लटाई
तुझसे लिप्ट-लिप्ट जाती हूँ, तेरे ही प्यार में
तेरे कितने चक्कर लगाती हूँ.
तू क्यों मुझसे छूट-छिटक जाता है
मेरे  ही कारण तो तू इस जग में इतनी धूम मचाता है .
छिटक ले जालिम जितना भी छिटकना चाहे
यह  तू भी जाने है कि मेरे बगैर  तेरा वजूद
कुछ  नहीं   रह   जाता है।
इसलिए  ही  तू मुझ तक लौट  लौट  के  आता है.....  
तू मेरा लट्टू
मैं तेरी लटाई
तुझसे लिप्ट-लिप्ट जाती हूँ, तेरे ही प्यार में
तेरे कितने चक्कर लगाती हूँ.
तू क्यों मुझसे छूट-छिटक जाता है। 

Saturday, August 27, 2016

भावनाएं  
बर्फ -सी जमीं होती हैं 
सभी के भीतर 
प्रेम-ऊष्मा से पिघलने को आतुर ...

पहले 
वे आद्र होंगी 
फिर वाष्प बनेंगी 
फिर हो जाएंगी ...
काफूर !
          -----       -सुरेंद्र भसीन 
    

Friday, July 8, 2016

संत पुस्तकें

श्री गुरू गोबिन्द सिंह जी          गुरू  नानक पुत्र संत श्रीचन्द्र 
समर्थ गुरू रामदास                  गुरू राम सिंह कूका 
श्री गुरू अगंददेव                     श्री गुरू नानकदेव जी 
संत कवि बखना जी                 संत तुकाराम 
संत वेमना                              सूफी संत मलिक मुहम्मद जायसी 
संत बाबा लाल जी                   संत कवि प्राणनाथ 
संत ज्ञानदेव                            संत कवि अक्खा 
संत कवि रामानन्द                  संत कवि पोत्तन्ना 
समर्थ गुरू स्वामी रामदास       संत कवि नितानन्द 
संत सुंदरदास                          संत कवि नामदेव 
संत कवि चरणदास                  संत दादूदयाल 
संत दरिया साहब (बिहार वाले ) संत तुलसी साहिब 
संत दयानन्द सरस्वती             संत निष्चलदास 
संत अमीर ख़ुसरो                    संत पलटू दास 
संत मीराबाई                          संत कवि अब्दुर रहीम 
संत कवि रज्जब                     संत तिरूवल्लुवर 
संत गरीबदास                         कृष्ण्भक्त रसखान 
गोस्वामी तुलसीदास               सूफी संत बुल्ले साहब 
संत कवि रामतीर्थ                   संत कवि माँ पीरो 
स्वामी श्रद्धा नन्द                    संत महात्मा फुले 
संत गाडगे बाबा                      संत रविदास 
सूफी संत बाबा फरीद              संत कवि सहजोबाई 
संत जैतराम                           संत मलूकदास 
विवेकानंद                              भक्त कवि सूरदास 
भगवान महावीर                    संत कबीरदास 
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