Wednesday, December 16, 2015

नियति

एक ओर ही नहीं 
डोर के दोनों ओर 
पतंग ही होती है लहराती-इठलाती 
मन में ऊँचा, बहुत ऊँचा और
सदा उड़ते ही जाने का अभिमान लिए। 
मगर क्या वे ऐसा कर पातीं हैं ?

अपना वक़्त खत्म होने पर 
धराशायी ही तो 
हो जाती हैं 
ईश्वर को पाने का अधूरा अरमान लिए। 

अँधेरे का क्रोध

हर जलते दिये के 
दायरे के बाहर 
काला अँधेरा 
घिरा रहता है सदा 
अपना मौका पाने को। 

जो दिये के बुझते ही 
झपट पड़ता है 
और अपने जोर से 
दिये और बाती को काला कर देता है, 
अपना बदला चुक जाने को।    

Wednesday, December 9, 2015

ऊब एक मृत्यु

बहुत 
लंबे समय तक 
एक ही रंग, एक  ही वस्तु 
देखते रहने या भोगते जाने  से 
ऊब- मर ही तो जायेगा आदमी। 

बाहरी और भीतरी प्रकृति की गति को 
एकसरता से जकड़ते ही, 
प्रकृति के अपेक्षाकृत 
कमजोर भीतरी तत्वों के कारण  
विखंडित ही तो हो जायेगा आदमी। 

तब भला इस नि:सार प्रकृति का क्या जायेगा ?

घट ही झन-झना कर टूट-बिखर जायेगा 
और जल तत्व 
भवसागर में विलीन हो जायेगा। 

वर्तमान से भविष्य......

भूतकाल से ही 
वर्तमान निकलता है और 
वर्तमान से भविष्य......   
यों तो यह सीधी लकीर है जीवन भरे बिन्दुओं की 
साँस में साँस 
हमारी जीवनमाल में आस के मनके पिरोती। 

साँस छूटने से कहीं पहले 
छूट चुकी होती है  चाह और आस जीने की। 
अगर तल शांत हो 
तो सुन सकते हो भीतरी तल से आती यह आवाज 
हमारे कहीं दूर खोने की....... 
भूतकाल में दफन सच होने की 
जो वर्तमान की परतों पर आता है 
आने वाला /होने वाला 
हमारा भविष्य कहलाता है और 
हमें अपने 
साथ ले जाता है। 

Monday, December 7, 2015

सामंजस्य और तालमेल

खिचड़ी और घालमेल से 
सामंजस्य और तालमेल कहीं ऊपर होता है,
लेन-देन और मोल-भाव से अलग
यह आजकल की सरकारें नहीं जानती 
इसलिए जनता की उम्मीदों पर खरा उतरना 
यह बिल्कुल भी वाजिब नहीं मानती। 

हार-जीत 
उनके लिये सत्ता का पहले ४०-६० था कभी
अब तो मुट्ठी भर अगड़ों-दगडों से भी नीचे उत्तर आया है और 
कौन अकेला अनपढ़ गंवार सौ पर भारी पड़ जाए 
यह राजनीति का कोई भी स्याना नहीं जानता। 

तालमेल से, सांमजस्य से 
बिना क्रोध के विरोध भी संभव है 
वरना भैंस के आगे बीन बजाने जैसा याफिर 
अंधे का स्वांग करने वाले को गंतव्य तक पहुंचाने जैसा 
सब कुछ असंभव है। 
जहाँ तालमेल में, सांमजस्य में 
एक ऋदम होता है, समझ होती है  और  
एक दूसरे के विचारों का स्थान होता है  
मगर खिचड़ी में, घालमेल में तो
घमासान होता है और  
सब का बस  भारी नुकसान होता है। 

























Thursday, December 3, 2015

आज इंसान/ प्रकृति

आज इंसान 
प्रकृति के निर्णयों से 
सहमत नहीं हो पाता है,
उनके सामने सिर नहीं झुकाता है,
नतमस्तक नहीं होना चाहता है

तो प्रकृति भी 
इंसान के कृत्यों को कहाँ 
वहन-सहन कर पाती है

दोनों में दिनों-दिन
दूरियां बढ़ती ही जाती हैं। 
इसलिए इंसान अगर प्रकृति को खाता है तो  
कभी प्रकृति भी 
इंसान को लील जाती है। 

Tuesday, December 1, 2015

संत / सूरज आशा भरा

ऊपर से 
नीचे की ओर ही 
उतरता है अँधेरा सदा
और जल्दी ही काली निराशा से ढक देता है सब कुछ। 

और ऊपर से ही 
उगता है कोई सूरज आशा भरा   
जो सारी कालिमा को समेट-मेट देता है। 

यों ये, सिलसिला जारी रहता है तब तक 
जब तक कि अँधेरा
हमारे भीतर ह्रदय में नहीं पसर जाता है,
आत्मा में नहीं उतर जाता है
हमारी पहचान बन। 

तब रोशनी का सूर्य 
उसे हटा नहीं सकता हमारी आत्मा से। 
तब कोई संत ही अपने संदेशों से,
परोपकार, सय्यम, ईश्वरनाम का जब 
अभ्यास कराता है। 
तभी, और केवल तभी 
भीतर तक पैठा निराशा का अँधेरा छंट पाता है। 
और मानव उल्लास भरा नवजीवन पाता है।