Friday, June 5, 2015

असली डर



भयभीत होकर मैं 
नींद से उठकर बाहर भागा 
और गॉँव के एक-एक घर की सांकल बजाकर मैंने कहा 
कि मुझे मालूम है कि वह आता है,
वह हर घर में आयेगा 
और बारी-बारी सबको ले जायेगा अपने साथ 
इसलिये उठो ! जागो ! बाहर निकलो !
गाँव के बीचों बीच कोई लोबान जलाओ 
या उससे प्राथना भरा, याचना भरा कोई गीत गाओ। 
मगर कोई भी,
एक भी घर से नहीं निकला बाहर … . 

फिर मैं न समझी में 
हांफता हुआ गॉँव के पुराने पेड़ के पास आया 
कि सुनो !
तुम तो यहाँ लम्बे अरसे से हो 
देखा होगा तुमने सब कुछ अपनी आँखों से कई बार। 

पेड़ बोला - हाँ वह आता है। 
हर घर में आता है 
और एक-एक कर साथ भी ले जाता है अपनो को 
मगर यहाँ कोई भयभीत नहीं है 
और न देगा कोई तुम्हारा साथ 
क्योंकि मुर्दों को कोई भय नहीं होता, अहसास नहीं होता 
तुम पहले इन्हैं जगाओ तो 
फिर  तो पाओगे इनका साथ।        

















Thursday, June 4, 2015

आवाज



अब बाहर नहीं 
भीतर ही होने लगी है आवाज 
कि कोई रुक -रुक कर 
दरवाज़े की सांकल बजाता और मुझे 
उठो जागो, उठो जागो की आवाज लगाता है..... 
आधा जग चुका सोचता हूँ कि चैतन्य भी हुआ तो 
क्या करूँगा मैं ? किससे बातें करूंगा ?
किससे बांटूंगा अपने विचार ?
यहाँ तो सब गहरी नींद में सोये हैं,
अपने-अपने सपनो मैं खोये हैं
भला मेरे लिए कौन अपनी नींद, अपना सपना, अपना बिस्तर 
छोड़कर आयेगा। बड़ा मुश्किल है। 

अब  पहले तो किसी एक को उठना होगा,
उसे सुबह का उगता सूरज दिखाना होगा। 
जब एक दिया जल जायेगा तोा ओरों को ,
फिर धीरे  धीरे  धीरे  ……   












Wednesday, June 3, 2015

ईश्वर




हममें से 
बहुत सारे यह नहीं जानते कि 
हममें ही ईश्वर का वास है 
और हमारी ली गई एक-एक सांस 
ईश्वर का ही उछवास है 
लेकिन जब हम अपने को दो नहीं एक मानें 
तभी वह हमें नज़र आता है 
वरना देह और आत्मा के द्वन्द में बंटकर 
विचारों की कंदराओं में ही लोप हो जाता है। 

मानों तो वह मानने के लिये है 
विचारने के लिये नहीं 
वरना वह नहीं, कहीं नहीं, है ही नहीं।  









गोकुल का श्याम



भरा 
पूरा जीवन 
तुम इस देह रूपी मुरली को धरे रहे 
जब चाहा,जैसे चाहा, जोंसा चाहा राग इसमें बेसुरी फूंक से बजाते रहे। 
कभी तुम 
इस बांसुरी की अपनी भी गुनो 
इसमें कौन,कब,कहाँ बसता है 
और इसकी मोहक-मधुर धुन में 
कौन श्याम हँसता है कुछ इसकी भी सुनो !

खेद है, तुमने इस बांसुरी से सदा 
वासना,अहं,क्रोध के सुर बजाये,
यानि कभी भी 
प्रेम,करुणा, त्याग के गीत  नहीं गाये।
यह  बांसुरी तुम्हें पशुवध  या  हिंसा के लिये नहीं दी गई थी जैसाकि 
तुमने इसका उपयोग किया और 
अपनी कलुषित भावना के सुरों को प्रकृति के जर्रे-जर्रे को सौंप दिया। 

अब तुम जानते हो अपने कुकर्मों को 
चाहकर भी तुम मिटा नहीं सकते और 
जो घृणित स्वर लहरियाँ तुमने फहरा दीं आकाश  में उन्हें मिटा  या 
हटा नहीं सकते। 

अगर तुम सुनते 
मुरली की बात तनिक ठिठक कर,
सहजता से, धर्य पूर्वक देते उसका साथ 
तो  तुम्हारे जीवन का, प्रकृति का सुर  कुछ  ओऱ होता 
और तुम्हारे  पूरे जीवन में 
अँधेरा नहीँ,पाप नहीं,
गोकुल का श्याम होता। 



















Tuesday, June 2, 2015

भय का सच


भय हो भीतर 
तो छोटी-छोटी आवाजें ही बड़ा डराती हैं 
पीठ मोड़ते ही , पीछे 
ठीक पीछे आ खड़ी हो जाती हैं..... 
और फुसफुसाहटें तो जैसे आँधियाँ बनकर 
समूचा वजूद ही कंपकपाने लगती हैं …
ऐसे में एक छोटी चुप भी 
भारी हो जाती है कि उठाये नहीं उठती …
अपनी सांस की आवाज तक परायी होकर 
कहीं बाहर से आती  है और 
माथे पर छलछलायी पसीने की बेजान बूँदें 
पारा हो ठस जाती हैं , ढुलाये नहीं ढुलतीं। 

सचमुच 
चाहे चुंटी के आकर का ही क्योँ न हो 
भय, ऐरावत से भी भारी होता  है 
और काले कसैले धुँयें से भरा होता है 
जोकि विश्वास की हवा का एक झोंका पाकर ही उड़ जाता है ,
याकि सच की रोशनी में 
बादलों -सा छिटक जाता  है।     










उजाला

काली अंधेरी रात-सी 
नींद ही उतरती है आँखों में 
और अपना, पराया, ये समूचा जहान ही 
विस्मृत हो जाता है कुछ वक्त के लिये ... ., 

पहले व्यक्ति खोता है उजाला 
फिर होश और आगे-आगे 
दंभ में व्यक्ति गिरता ही जाता है पराई काली गार में …। 

होश आने पर 
शालीनता व ताजगी लिए 
तरोताजा हो 
उठ खड़ा होता है 
अपनेपन  का 
आकाश लिये ,प्रकाश लिये। 

जहरीले निशान



माना कि 
आत्मा -  अजर है,अमर है 
मगर देह पर पड़े 
आघात के अनुपात में 
वह हर बार डगमगा जरूर जाती है,
जैसे हवा के झोंकों से झपझपाती कोई दीप लौ ।

चेतना पर हुए वार से भी 
आत्मा यूँ सिकुड़ती है 
जैसे भय से सहमती काली रोयंदार बिल्ली,
जो  फिर अरसे सामान्य नहीं हो पाती  और 
हादसे के काले रंग में डूबे पंजे के जहरीले निशान आत्मा पर आ जाते हैं 
जो पोंछ्ने पर भी 
अपने धब्बे छोड़ जाते हैं। 
यूँ कुछ घटनाएं ,कुछ हादसे 
जीवन भर भूले नहीं जाते हैं।