Tuesday, June 2, 2015

जहरीले निशान



माना कि 
आत्मा -  अजर है,अमर है 
मगर देह पर पड़े 
आघात के अनुपात में 
वह हर बार डगमगा जरूर जाती है,
जैसे हवा के झोंकों से झपझपाती कोई दीप लौ ।

चेतना पर हुए वार से भी 
आत्मा यूँ सिकुड़ती है 
जैसे भय से सहमती काली रोयंदार बिल्ली,
जो  फिर अरसे सामान्य नहीं हो पाती  और 
हादसे के काले रंग में डूबे पंजे के जहरीले निशान आत्मा पर आ जाते हैं 
जो पोंछ्ने पर भी 
अपने धब्बे छोड़ जाते हैं। 
यूँ कुछ घटनाएं ,कुछ हादसे 
जीवन भर भूले नहीं जाते हैं। 

Friday, May 29, 2015

पेड़ का दर्द



वेदनायें 
कैसे जमीं रहती हैं सालों -साल किसी की देह में 
देखना हो तो किसी पेड़ के चिरने से 
उसके भीतर बनी आवृत्तियों से जानों 
और अपने दर्द का बह जाना, शिराओं में गल जाना 
अपना सौभाग्य मानों। 

विंडबना है कि बात- बात में अपना पूर्वज मानकर 
उसकी कसमें खाने वाला इंसान भी 
कैसे पहले मौके में ही उसे चीरकर 
उसको अपनी सुविधा बनाता है , उसके दर्द को नहीं पालता 
तभी पेड़ का दर्द फैलाव पाकर भी पूरा नहीं होता और उसके 
आंसू तक धरती नहीं छू पाते
गोंदीले मोतियों से ढुलक कर शरीर से ही लटक जाते हैं 
बार -बार उसी की देह का श्रृंगार बन, 
जिसने अपने के चिरने  व कटने की चीत्कार 
सुनी हो बारम्बार। 

पेड़ का यही गम सालता है उसे 
तभी पेड़ जब तक ठूंठ बना खड़ा रहता है 
अपने असंख्य हाथ उठाकर करता है आतर्नाद ही  
हे ईश्वर! हे ईश्वर!













Thursday, May 28, 2015

मृगमरीचका



तवे से तप कर तुम्हारा फुल्का प्रेम 
ही उतरता है मेरे हाथों 
जो हमारे बीच रोज़ थालियों में बंटता है 
तुम्हारा स्नेह बनकर और 
हमारा अणु -अणु रक्त पोर जाता है 
अनूठी मिठास बनकर। 

हर बार
जब हम भीतर होते हैँ घर के 
तुम्हारी सुविधाओं के छाये तले 
तब तुम हमारे लिये कुछ और जुगाड़ने की बिसात में 
ग्राहकों की इचछाएँ पूरी कर रहे होते हो या 
बीच सड़क के बिगड़े ट्रक या बस को सधा रहे होते हो या 
चलते रेल के इंजन के साथ पटरियों पर उनींदे दौड़ रहे होते हो 
किसी और को गंतव्य तक पहुंचाने के लिये।   

तुम्हारे पास 
हमारी हर जरूरत का आभास 
उसके उभरने से पहले ही है 
तुम उन्हें 
अपने तजुर्बे व पूर्वानुमानों से भाँप लेते हो 
और हमारे कहते न कहते ही उन्हें अपनी 
छोटी -सी हां से ढांप लेते हो। 

सालों साल से 
अल सुबह आईने के समक्ष दाढ़ी रगड़कर तुम 
तैयार होकर काम पर निकल जाते हो और 
दिनों -दिन भीतर से सूखे-खोखले व पुराने हुए जाते हो जैसे कोई 
सोफ़ा सेवा देता -देता पुराना होता जाता है, ये अहसास 
हमें रोज़ नहीं होता मगर कभी,
कभी तो  होता  है उसमें कुछ कड़कने के बाद.... 

समझो इसी तरह 
घर को बनाते- बनाते 
इंसान खुद सदा के लिये बेघर हो जाता है। 
और अपनों की चाहत में 
उनसे ही बिछुड़ जाता है।     





















पहचान



मेरा कोई नाम नहीं है 
मैं नहीं रखना चाहता 
तुम्हारे मानसपटल पर 
अपनी कोई पहचान। 

मैं नहीं चाहता कि पहले से 
मुझे कोई पहचाने -पुकारे 
और मुझे मस्तिष्क के किसी 
कोष्ठक व खाँचे में धकेलकर 
पुरातन -अंदाजतेन करे मुझसे व्यवहार। 
मुझे 
स्त्री -पुरष -धर्म -देश -पशु -पक्षी  या पेड़ जैसे 
विभाजन भी नहीं हें स्वीकार। 
मै तो बस हूँ 
और रहूंगा 
यही है मेरा आकार।   





Wednesday, May 27, 2015

समन्वय



इतने कठोर,
इतने अहिशुन मत बनो 
तुम अपनी इस देह के प्रति 
अगर प्रभु के दर्शन इसने तुम्हें नहीं भी कराये तो क्या हुआ
देह धर्म का पालन तो मनोयोग से किया। 
याद करो कि ता उम्रह 
जीवन रस को , चाहतों को , वासनाओं को 
तुमने इसी देह से जीआ 
और अनगिनत भावनाओं के आवेग को 
तुमने इस लपलपाती देह से ही पीया।  
आज जब यह खोखली हो चुकी देह 
नये अनुभवों को पकड़ने में असमर्थ है 
तो तुम बेगानों के हाथों इसे 
धधका-धधका कर जला डालना चाहते हो। 
तुम  यह  क्यों नहीं समझते 
कि इससे भी कठोर सजा की हकदार 
तो तुम्हारी आत्मा ही है 
जिसने संस्कारों व आदर्शों का संग्रह न करके 
उसके उजालों से इस देह को महरूम रखा,
जिसने इस देह को इतना भटकाया और 
इन्द्रिओं के हाथों में बेहतहाशा घुमाया उस 
आत्मा के कुसुर का तुमने क्या ?
न  उसे तुमने तपाया न गलाया और 
न ही उसे देह धर्म की सीमाओं व आत्मा धर्म का पाठ ही पढ़ाया। 
बस, छोड़ दिया मुक्त - स्वछंद 
दूसरी नई देह में उतर जाने को, भ्रिमित करने  को। 
अच्छा हो 
इसे भी यहीं तपाओ 
और देह से इसका समन्वय कैसा हो 
इसका पाठ पढ़ाओ। 
















Tuesday, May 26, 2015

सीख



ऊँचे पहाड़ों से
यूँ ही नहीं पहुँचता पानी
झरने से होता हुआ नदिंयों तक।
वह अपने रास्ते की चट्टानों से टकराता
उन्हें रगड़ता -तोड़ता -मेटता ,
उनके  बारीक से बारीक छिद्रों का लाभ उठाता
और मजबूर करके उन्हें अपने संग घसीट लाता है
नदियों  व मैदानों में।
यह हमे यही तो सिखलाता है कि भले
जीवन की समस्याऐं बनी हों कितनी भी कठोर चट्टानों से
मगर उनको बहा कर
चलते जाना ही जीवन है।  

बचपन



ज़रा सोचो तो 
बच्चे भला कहाँ से आते हैं? 

बच्चे तो हमारे भीतर बचपन में ही होते हैं बीज रूप होकर 

जब हम बड़े होते हो जाते हैं 
तो हमारा बचपन भी 
बाहर निकल जाता है बड़ा होकर
इसलिये फिर कभी 
हम बच्चे नहीं हो पाते हैं 
चाहे हम बूढ़े हो जाते हैं 
बच्चे नहीं हो पाते हैं।